स्वामी अवधेशानंद जी गिरि जी

मुण्डकोपनिषद् का यह मंत्र एक उत्कृष्ट रूपक के माध्यम से उस आध्यात्मिक साधना की व्याख्या करता है

श्रीसद्गुरु आशीषवचनम्
— “प्रभुश्री की लेखनी से” —
07 जुलाई, 2025 (सोमवार)

धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं
शरं ह्युपासा निशितं सन्धयीत ।
आयम्य तद्भावगतेन चेतसा
लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥
– मुण्डकोपनिषद् २.२.३

मुण्डकोपनिषद् का यह मंत्र एक उत्कृष्ट रूपक के माध्यम से उस आध्यात्मिक साधना की व्याख्या करता है, जो अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति के लिए आवश्यक है। भगवद्पादाचार्य आद्य शंकराचार्य इस मंत्र की व्याख्या में दर्शाते हैं कि कैसे उपनिषद् ज्ञान, उपासना और चित्त की एकाग्रता को साधक का शस्त्र बनाकर उसे परम सत्य — अक्षर ब्रह्म — तक पहुँचाता है।

“धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं” — उपनिषद् को धनुष रूप में ग्रहण करो।
यह कोई साधारण धनुष नहीं, अपितु महास्त्र है-आत्मज्ञान का सबसे श्रेष्ठ साधन। शंकराचार्य इसे “ब्रह्मविद्या रूप धनुष” बताते हैं- जिसका प्रयोग साधक को मुक्ति की दिशा में करना चाहिए।

“शरं ह्युपासा निशितं सन्धयीत” — उपासना ही वह तीव्र बाण है, जो इस धनुष पर चढ़ाया जाना चाहिए।
यह बाण निशित है — धारदार, परिपक्व, सजग।
भगवद्पादाचार्य आद्य शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि बिना उपासना के केवल ज्ञान निर्जीव रहता है, इसलिए ब्रह्म की निरन्तर उपासना चित्त को विशुद्ध बनाती है, जिससे आत्मबोध की सम्भावना जागृत होती है।

“आयम्य तद्भावगतेन चेतसा” — चित्त को ब्रह्मभाव में स्थिर कर लक्ष्य की ओर साधो।
यह एकाग्र चित्त ही साधना की सफलता का मूल है। भगवद्पादाचार्य आद्य शंकराचार्य कहते हैं — “तद्भावगति” अर्थात् चित्त की पूर्ण अभिन्नता उस ब्रह्म के साथ, जहाँ साधक स्वयं को भूलकर ब्रह्मभाव में स्थित हो जाता है।

“लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि” — हे सोम्य! वही अक्षर ब्रह्म ही तुम्हारा लक्ष्य है — उसी को विद्धि (भेदो, जानो)।
यह उपनिषद् की महावाणी है — आत्मा रूप बाण को ब्रह्म लक्ष्य में संधान करो, और तब सारा भेदभाव मिट जाएगा।
शंकराचार्य बताते हैं कि यहाँ विद्धि शब्द केवल “जानो” नहीं, अपितु “साक्षात् आत्मा के रूप में अनुभव करो” इस अर्थ में है।

यह मंत्र आत्म-साक्षात्कार की अग्निबाण साधना है। उपनिषद् आत्मज्ञान का धनुष है, उपासना उसका बाण और ध्यान उसकी डोरी। जब चित्त पूर्णतः ब्रह्मभाव में स्थिर होता है, तब साधक अपनी आत्मा से उस अक्षर ब्रह्म को भेदकर नहीं, विलीन होकर प्राप्त करता है।

भगवद्पादाचार्य आद्य शंकराचार्य का अद्वैत है – ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान — तीनों का लय।

 

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भगवद्पादचार्य आद्य शंकराचार्य के अनुसार, ब्रह्म शब्दातीत, अव्यवहित और निर्गुण है

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