भगवद्पादचार्य आद्य शंकराचार्य के अनुसार, ब्रह्म शब्दातीत, अव्यवहित और निर्गुण है

“दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्; ध्यानम्”

मौनव्याख्या प्रकटित परब्रह्मतत्त्वं युवानं
वर्षिष्ठान्ते वसदृषिगणैः आवृतं ब्रह्मनिष्ठैः।
आचार्येन्द्रं करकलितचिन्मुद्रमानन्दरूपं
स्वात्मारामं मुदितवदनं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥१॥

भगवद्पादचार्य आद्य शंकराचार्य के अनुसार, ब्रह्म शब्दातीत, अव्यवहित और निर्गुण है। “यतो वाचो निवर्तन्ते, अप्राप्य मनसा सह” — यह वाक्य उपनिषदों का सार है। भगवान दक्षिणामूर्ति, जो स्वयं सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म हैं, शब्दों का नहीं, मौन का आश्रय लेकर ज्ञान का संप्रेषण करते हैं। यह मौन, केवल निःशब्दता नहीं — ब्रह्मबोध की उपस्थिति है, जो वाणी के परे, अंतःकरण के गह्वर में प्रकाशित होती है।

भगवद्पाद शंकराचार्य स्पष्ट संकेत करते हैं कि “श्रवण, मनन, निदिध्यासन” के अंत में बोध होता है — और वह मौन में ही घटित होता है। भगवान दक्षिणामूर्ति की मौन व्याख्या उसी अन्तिम बोध की प्रतीक है — “द्रष्टा दृष्टेन्द्रियवियोगेऽपि न प्रकाशते”*।

“युवानं” ब्रह्म की चिरनवीनता !

ब्रह्म नित्य है, अजन्मा है, अविकारी है- फिर भी चेतना की यह अजस्र धारा सदा नवीन बनी रहती है। भगवान दक्षिणामूर्ति का युवा रूप इस सत्य को दर्शाता है कि ब्रह्मज्ञान कालातीत है, वह न वृद्ध होता है, न शैशव। जैसे नदी का प्रवाह सनातन होता है, वैसे ही आत्मबोध भी सदा नवोन्मेषी है।

“वर्षिष्ठान्ते वसदृषिगणैः आवृतं ब्रह्मनिष्ठैः” !

यह दृश्य शिष्य-गुरु परम्परा का अद्वितीय चित्र है। वृद्ध और तपस्वी ऋषिगण, जो ब्रह्मनिष्ठ हैं, उस युवा भगवान दक्षिणामूर्ति के चारों ओर बैठे हैं। यह ज्ञान के विनम्र अनुशासन का परिचायक है — कि बुद्धि और अनुभव भी उस स्वयंप्रकाश आत्मतत्त्व के सामने मौन साधना करते हैं।

यहाँ भगवद्पाद शंकराचार्य का शिक्षा-दर्शन परिपुष्ट होता है — “गुरवे ब्रह्म्मविध्याय नमः” — जहाँ गुरु न केवल उपदेशक है, वरन् स्वयंसिद्ध ब्रह्मस्वरूप है।

“आचार्येन्द्रं करकलितचिन्मुद्रमानन्दरूपं” !

भगवान दक्षिणामूर्ति का हाथ चिन्मुद्रा में है — जिसमें तर्जनी और अंगुष्ठ मिलते हैं और शेष तीन अंगुलियाँ प्रसारित रहती हैं।
तर्जनी (जीवात्मा),
अंगुष्ठ (परमात्मा),
और तीन अन्य उंगलियाँ अविद्या, काम और कर्म का प्रतीक हैं।
जब ये विकार दूर होते हैं, तब जीव और ब्रह्म का मिलन होता है, और वही ब्रह्म साक्षात्कार है। यही वेद का महावाक्य है — “तत्त्वमसि”।

“आनन्दरूपं” — ब्रह्मस्वरूप का मुख्य लक्षण है “आनन्द”, जिसे तैत्तिरीयोपनिषद् कहती है: “रसवैतत्, रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति”।

“स्वात्मारामं मुदितवदनं” !

जो आत्मा में रमण करता है, वही स्वात्माराम है। वह बाह्य आश्रय से मुक्त है, और केवल अपने स्वस्वरूप में स्थित है। भगवद्पाद आद्य शंकराचार्य इस अवस्था को “आत्मन्येव आत्मा तुष्टः” कहते हैं।

उनका मुख प्रसन्न है — क्योंकि उन्हें कोई कामना, दुःख या संशय नहीं है। यह वह मुक्ति की स्थिति है, जिसे शंकर ने “जीवन्मुक्ति”, “सर्वकर्मसंन्यास” और “ब्रह्मात्मैक्यबोध” कहा है।

यह श्लोक केवल एक ध्यान नहीं, अपितु शंकर-वेदान्त का प्रतीकात्मक ग्रन्थ है। भगवान दक्षिणामूर्ति उस ज्ञान की मूर्ति हैं, जो शब्दों से नहीं, मौन से बोध कराते हैं, जो युवा होकर भी सनातन हैं, जो चिन्मुद्रा में ज्ञान की गूढ़तम परिभाषा रखते हैं, और जो आत्मा में रमण करते हुए अनुग्रह-भाव से युक्त हैं।

इस ध्यान के माध्यम से भगवद्पादाचार्य भगवान शंकराचार्य हमें श्रवण, मनन और निदिध्यासन की पूर्णता में ले जाते हैं, जहाँ मौन ही अंतिम उत्तर है।

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