राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की घनी आबादी वाले इलाकों में अवैध और कमजोर इमारतों का खतरा एक बार फिर सामने आया है। सत्य निकेतन में इमारत गिरने की घटना ने राजधानी की बिल्डिंग सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दिल्ली के कई इलाकों में कम जगह में ज्यादा निर्माण करने का चलन बढ़ता जा रहा है। जहां जगह मिलती है, वहां अतिरिक्त कमरे बनाकर किराये पर दे दिए जाते हैं। कई मकानों को पीजी, हॉस्टल और दूसरी व्यावसायिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब पुराने मकानों में बिना अनुमति के अतिरिक्त मंजिलें बना दी जाती हैं। ऐसे निर्माण से इमारत पर अतिरिक्त भार बढ़ता है और उसकी मजबूती प्रभावित हो सकती है।
सत्य निकेतन में जिस इमारत के गिरने की घटना हुई, वह काफी पुरानी बताई जा रही है। आरोप है कि तीन मंजिल की अनुमति वाली इमारत को बढ़ाकर पांच मंजिल तक बना दिया गया था। इमारत के पास मौजूद एक अन्य बिल्डिंग की हालत भी चिंताजनक बताई गई है। इसे फिलहाल लोहे के सपोर्ट देकर संभाला गया है, क्योंकि उसके झुकने की बात सामने आई है। हादसे के बाद संबंधित अधिकारियों ने कार्रवाई शुरू कर दी है। दिल्ली नगर निगम अधिनियम के तहत इमारत को हटाने का आदेश भी जारी किया गया है।
दिल्ली में किसी भी प्लॉट पर कितनी मंजिल का निर्माण किया जा सकता है, इसका फैसला केवल एक नियम से नहीं होता। इसके लिए जमीन का आकार, सड़क की चौड़ाई, इलाके की स्थिति और FAR यानी Floor Area Ratio जैसे कई मानकों को देखा जाता है। इन्हीं नियमों के आधार पर भवन का नक्शा तैयार होता है और निर्माण की अनुमति दी जाती है। यानी हर जगह एक जैसी ऊंचाई वाली इमारत बनाने की अनुमति नहीं होती। प्लॉट और इलाके के हिसाब से निर्माण की सीमा अलग हो सकती है।
निर्माण पूरा होने के बाद भी प्रक्रिया खत्म नहीं होती। भवन के इस्तेमाल से पहले जरूरी औपचारिकताओं और प्रमाणपत्रों की जरूरत होती है। Occupancy Certificate के जरिए यह देखा जाता है कि तैयार इमारत स्वीकृत नक्शे के अनुसार बनी है या नहीं। इसके अलावा भवन की मजबूती से जुड़े Structural Safety Certificate जैसे दस्तावेज भी महत्वपूर्ण होते हैं। नियमों का उद्देश्य यही है कि इमारत सुरक्षित तरीके से बने और उसमें रहने वाले लोगों की जान को खतरा न हो।
सिर्फ निर्माण के समय सुरक्षा जांच काफी नहीं है। समय के साथ किसी भी इमारत की स्थिति बदल सकती है। पुरानी इमारतों में दरारें, कमजोर दीवारें, जंग लगे लोहे के हिस्से या बिना अनुमति किए गए बदलाव खतरा बढ़ा सकते हैं। इसलिए समय-समय पर भवन की संरचनात्मक स्थिति की जांच करना भी जरूरी है। अगर किसी इमारत को खतरनाक पाया जाता है तो संबंधित प्राधिकरण उसे खाली कराने या जरूरी कार्रवाई करने का आदेश दे सकता है।
सत्य निकेतन हादसे में अब तक 7 लोगों की मौत होने की जानकारी सामने आई है। राहत और बचाव अभियान भी जारी बताया गया है और मलबे में अन्य लोगों के फंसे होने की आशंका जताई गई है। मामले में पुलिस ने FIR दर्ज की है। यह केस BNS की धारा 105, 290 और 125(a) के तहत दर्ज किया गया है। FIR में बिल्डिंग के मालिक हरिराम सहित अन्य लोगों को आरोपी बनाया गया है। पुलिस के अनुसार, इमारत का इस्तेमाल PG के तौर पर किया जा रहा था।
पुलिस जांच में यह बात भी सामने आई है कि हादसे से पहले इमारत के ग्राउंड फ्लोर पर निर्माण या रेनोवेशन का काम चल रहा था। आशंका है कि निर्माण कार्य के दौरान इमारत की संरचना कमजोर हुई और इसके बाद हादसा हुआ। हालांकि हादसे की सही वजह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।पुलिस ने आरोपियों की तलाश के लिए कई टीमें लगाई हैं। वहीं राहत और बचाव एजेंसियां मौके पर लगातार काम कर रही हैं।
दिल्ली में जब भी कोई इमारत गिरती है, उसके बाद FIR, सीलिंग और तोड़फोड़ जैसी कार्रवाई शुरू होती है। लेकिन कुछ समय बाद कई इलाकों में फिर से अवैध निर्माण शुरू होने के आरोप लगते हैं। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इमारत क्यों गिरी। बड़ा सवाल यह भी है कि अगर निर्माण नियमों का उल्लंघन हो रहा था तो उसे समय रहते रोका क्यों नहीं गया?
दिल्ली की संकरी गलियों में खड़ी पुरानी और कमजोर इमारतों की नियमित जांच और अवैध निर्माण पर प्रभावी कार्रवाई ही भविष्य में ऐसे हादसों का खतरा कम कर सकती है।
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