Haryana : नहीं तैयार हो रहे नए नेता, विधायकों पर खेला जा रहा दांव..

चंडीगढ़ : हरियाणा में बीजेपी और कांग्रेस समेत अन्य पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया है. खास बात यह है कि भाजपा और कांग्रेस बड़ी पार्टियां हैं और उन्होंने अपने विधायकों पर भरोसा करना उचित समझा है, जबकि पार्टियां इतने लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद हर लोकसभा क्षेत्र में एक नेता तैयार करने में विफल रही हैं। बीजेपी की बात करें तो बीजेपी ने सोनीपत लोकसभा सीट से राई विधायक मोहनलाल बडोली पर अपना दावा जताया है.

इसी तरह, हिसार से निर्दलीय सांसद रणजीत चौटाला को अपनी पार्टी में शामिल किया गया और उम्मीदवार के रूप में नामित किया गया। कांग्रेस पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए नवीन जिंदल को कुरूक्षेत्र से उम्मीदवार घोषित किया गया है. पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल को करनाल से उम्मीदवार बनाया गया है। करनाल के पूर्व विधायक ने महेंद्रगढ़ से कांग्रेस विधायक राव दान सिंह को महेंद्रगढ़ की भिवानी सीट से अपना उम्मीदवार बनाया, वहीं दूसरी ओर मुलाना विधायक वरुण चौधरी को अंबाला लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार बनाया.

रोहतक लोकसभा सीट से राज्यसभा सदस्य दीपेंद्र हुड्डा को पार्टी ने मैदान में उतारा है. रोहतक लोकसभा सीट पर हार या जीत पर कांग्रेस के लिए दोनों ही बातों में नुकसान होगा. क्योंकि अगर वह जीते तो उन्हें राज्यसभा सीट छोड़नी होगी. उस पर जब चुनाव होगा तो वह सीट आंकड़ों के हिसाब से बीजेपी के खाते में जाएगी. अगर दीपेंद्र हुड्डा हारते हैं तो एक लोकसभा सीट को कांग्रेस लूज करती हुई नजर आएगी.

जननायक जनता पार्टी हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी के साथ सहयोगी बनकर साढे चार साल तक सरकार में रही. उन्होंने भी हिसार लोकसभा सीट से बाढ़डा से विधायक नैना चौटाला को मैदान में उतारा है. इनेलो की बात करें तो खुद अभय सिंह चौटाला ऐलनाबाद से विधायक हैं और अब वह कुरुक्षेत्र लोकसभा से चुनावी ताल ठोक रहे हैं.

ऐसे में सवाल यह है कि एक पद होते हुए भी बार-बार उन्हीं लोगों को दूसरे चुनाव का भी टिकट दिया जा रहा है.क्या पार्टियों के पास नेताओं की कमी है .क्या दोनों राष्ट्रीय पार्टी और जेजेपी व इनेलो इतने समय राज करने के बावजूद भी एक लोकसभा क्षेत्र में अपने नेता तैयार नहीं कर पाई. सभी पार्टी चुनाव में जीत के लिए उतरती हैं और ऐसे में एक ही नाम पर बार-बार दांव खेला जाना,  वह चाहे विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव, कहीं ना कहीं कार्यकर्ताओं का मनोबल जरूर गिराता है. राजनीतिक पार्टियों ने जिस तरह से अपने विधायकों पर विश्वास करके उन्हें लोकसभा का उम्मीदवार बनाया है. अब देखना यह होगा कि वह उनकी उम्मीदों पर कितना खरा उतरते हुए नजर आते हैं.

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