UTTAR PRADESH ELECTION 2027: 'साइकिल' से उतरे, ‘सुभासपा’ में चले ‘सपाई’!
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो गई है और शह-मात के इस खेल में पाला बदलने का सिलसिला भी तेज हो गया है… हाल ही में राजधानी लखनऊ में एक ऐसा राजनीतिक घटनाक्रम हुआ, जिसने समाजवादी पार्टी के खेमे में हलचल मचा दी है। दिल्ली, गाजियाबाद, बिजनौर, शाहदरा, प्रतापगढ़, अमरोहा और लखनऊ जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से आए लगभग 30 कद्दावर नेताओं, ग्राम प्रधानों और समर्पित कार्यकर्ताओं ने सपा का साथ छोड़कर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का दामन थाम लिया… जिसे समाजवादी पार्टी के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि पार्टी छोड़ने वालों में कोई आम कार्यकर्ता नहीं, बल्कि सपा के राष्ट्रीय सचिव जावेद आलम जैसे बड़े नाम शामिल हैं।
लखनऊ में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम के दौरान सुभासपा के राष्ट्रीय मुख्य प्रवक्ता अरुण राजभर की मौजूदगी में इन सभी नेताओं को पार्टी की सदस्यता दिलाई गई… इस मौके पर सुभासपा नेताओं ने पूरे आत्मविश्वास के साथ दावा किया कि, पार्टी का संगठन अब केवल कुछ क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे प्रदेश और पड़ोसी राज्यों में भी अपनी पैठ बना रहा है।
सुभासपा में शामिल होने वालों की सूची केवल राजनीतिक चेहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक संगठनों पर पकड़ रखने वाले लोग भी इसमें शामिल हैं। बुनकर मजदूर विकास समिति से जुड़े कई पदाधिकारियों ने भी सुभासपा का दामन थामा है…
इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं: शहाबुद्दीन अंसारी, डॉ. मोहम्मद नाजिम अंसारी, ताजुद्दीन अंसारी, खालिद सैफी, अयूब अंसारी….
पार्टी नेतृत्व का मानना है कि बुनकर समाज और अन्य सामाजिक संगठनों के इन प्रभावशाली नेताओं के आने से संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूती मिलेगी।
कार्यक्रम का सबसे चर्चित हिस्सा वो रहा जब अरुण राजभर ने समाजवादी पार्टी की विचारधारा और उनके हालिया नारों पर जमकर तंज कसा… सपा जिस ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे को अपनी जीत का मंत्र बता रही है, सुभासपा ने उसकी नई व्याख्या कर डाली।
अरुण राजभर ने कहा कि, समाजवादी पार्टी का पीडीए नारा जनहित के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक अवसरवादिता की उपज है… सच्चाई तो ये है कि अब PDA का असली मतलब ‘पार्टी ऑफ डिंपल एंड अखिलेश’ रह गया है। ये कुनबापरस्ती की राजनीति का प्रतीक बन चुका है, जहां आम कार्यकर्ता की मेहनत का फल सिर्फ एक परिवार की झोली में जाता है।
अरण राजभर ने तंज कसते हुए कहा कि, सपा के नेतृत्व ने जमीन से जुड़े उन नेताओं को नजरअंदाज किया जिन्होंने खून-पसीना बहाकर पार्टी को खड़ा किया था। आज वही उपेक्षित नेता सुभासपा की नीतियों और नेतृत्व में भरोसा जता रहे हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल तक के नेताओं का एक साथ सुभासपा में शामिल होना ये संकेत देता है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में समीकरण बदल सकते हैं। बिजनौर, अमरोहा और गाजियाबाद जैसे जिलों में सपा का एक मजबूत आधार रहा है, लेकिन जावेद आलम जैसे नेताओं का जाना उस आधार में दरार पैदा कर सकता है।
सुभासपा नेताओं ने स्पष्ट किया कि, ये तो बस शुरुआत है। आने वाले समय में कई और बड़े नाम और विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधि पार्टी से जुड़ने के लिए कतार में हैं। सदस्यता ग्रहण समारोह में उमड़ी समर्थकों की भारी भीड़ इस बात की तस्दीक कर रही थी कि सुभासपा अब एक आक्रामक विकल्प के रूप में उभर रही है।
समाजवादी पार्टी के लिए ये आत्ममंथन का समय है। एक तरफ जहां उनके पुराने सिपहसालार साथ छोड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल उनके नारों की हवा निकालने में जुटे हैं। सुभासपा ने इस बड़ी सेंधमारी के जरिए ये संदेश दे दिया है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता अब उनके संगठन की मजबूती से होकर गुजरेगा। ‘पार्टी ऑफ डिंपल एंड अखिलेश’ के तंज ने चुनावी माहौल में गर्माहट पैदा कर दी है, जिसका असर आने वाले मतदान केंद्रों पर साफ दिखाई दे सकता है।
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