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सरधना में मायावती ने बिछाई बिसात, BJP के संगीत सोम के सामने जाट कार्ड, किसका बिगड़ेगा खेल?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सरधना विधानसभा सीट पर 2027 के चुनाव से पहले ही सियासी मुकाबला दिलचस्प होता दिख रहा है। बीजेपी के चर्चित नेता संगीत सोम एक बार फिर इस सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। वहीं, विपक्ष ने उनके खिलाफ मजबूत रणनीति बनानी शुरू कर दी है।

समाजवादी पार्टी के मौजूदा विधायक अतुल प्रधान का फिर से चुनाव लड़ना लगभग तय माना जा रहा है। वहीं, बहुजन समाज पार्टी ने जाट समुदाय से आने वाले विनीत भराला को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। बसपा ने वलीदपुर में जनसभा कर उनकी उम्मीदवारी का ऐलान किया।

उम्मीदवार बनने के बाद विनीत भराला ने कहा कि उन्हें सरधना के सभी वर्गों का समर्थन मिल रहा है। उनके मैदान में आने के बाद मुकाबला अब त्रिकोणीय होने के आसार हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि बसपा का जाट कार्ड किसके वोट काटेगा—संगीत सोम के या अतुल प्रधान के?

कौन हैं विनीत भराला?

विनीत भराला का असली नाम विनीत चौधरी है। वह सरधना के भराला गांव के रहने वाले हैं, इसलिए इलाके में उन्हें विनीत भराला के नाम से जाना जाता है। उनके पिता सत्यप्रकाश भराला समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता रहे थे और दो बार विधानसभा चुनाव लड़ चुके थे।

साल 2008 में सत्यप्रकाश भराला की हत्या कर दी गई थी। इसके बाद विनीत भराला ने सपा की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। वह सपा के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन अतुल प्रधान के मौजूदा विधायक होने के कारण टिकट मिलने की संभावना कम नजर आई। इसके बाद उन्होंने बसपा का रुख कर लिया।

2022 में संगीत सोम को हरा चुके हैं अतुल प्रधान

सरधना सीट पर अतुल प्रधान और संगीत सोम के बीच पहले भी सीधा मुकाबला हो चुका है। 2022 के विधानसभा चुनाव में अतुल प्रधान ने संगीत सोम को हराया था। अतुल प्रधान गुर्जर समुदाय से आते हैं और इलाके में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। दूसरी तरफ संगीत सोम सरधना से दो बार विधायक रह चुके हैं। ऐसे में विनीत भराला की एंट्री के बाद यहां तीन बड़े चेहरों के बीच मुकाबला देखने को मिल सकता है।

बसपा का दलित-मुस्लिम-जाट फॉर्मूला

बसपा की कोशिश इस चुनाव में दलित, मुस्लिम और जाट वोटों को अपने पक्ष में जोड़ने की है। पार्टी पहले भी सरधना सीट जीत चुकी है। ऐसे में विनीत भराला को जाट उम्मीदवार बनाकर बसपा ने एक खास वोट बैंक पर निशाना साधा है।सरधना में जाट मतदाताओं की संख्या करीब 50 हजार बताई जाती है। वहीं मुस्लिम वोटर लगभग एक लाख, ठाकुर करीब 60 हजार, गुर्जर करीब 40 हजार और दलित मतदाता करीब 45 से 50 हजार हैं। यही जातीय समीकरण चुनाव के नतीजे पर बड़ा असर डाल सकता है।

संगीत सोम के लिए क्यों बढ़ी मुश्किल?

संगीत सोम की राजनीति में जाट और राजपूत वोटों का समीकरण काफी अहम रहा है। 2012 और 2017 के चुनाव में उन्हें जाट और राजपूत मतदाताओं के समर्थन का फायदा मिला था। लेकिन अब परिस्थितियां पहले जैसी नहीं हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी के नेता संजीव बालियान और संगीत सोम के बीच राजनीतिक खींचतान भी सामने आई थी। इसके बाद पश्चिमी यूपी में जाट और ठाकुर राजनीति को लेकर चर्चा तेज हुई।

हालांकि बीजेपी और आरएलडी के गठबंधन से संगीत सोम को जाट वोट मिलने की उम्मीद है, लेकिन बसपा ने जाट उम्मीदवार उतारकर इस वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की है। अगर जाट वोट तीन हिस्सों में बंटता है, तो इसका सीधा असर संगीत सोम के चुनावी गणित पर पड़ सकता है।

अतुल प्रधान को भी नुकसान या फायदा?

2022 में सपा और आरएलडी गठबंधन का फायदा अतुल प्रधान को मिला था। उस समय बड़ी संख्या में जाट मतदाता सपा गठबंधन के साथ गए थे। अब आरएलडी बीजेपी के साथ है। ऐसे में जाट वोट का एक हिस्सा बीजेपी गठबंधन के साथ जाने की संभावना है। लेकिन बसपा के जाट उम्मीदवार विनीत भराला इस वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं। अगर विनीत अपने समुदाय का बड़ा हिस्सा अपने साथ जोड़ने में सफल रहे, तो इसका असर संगीत सोम के साथ-साथ अतुल प्रधान पर भी पड़ सकता है।

अब मुकाबला किस करवट जाएगा?

सरधना में मुस्लिम, जाट, ठाकुर, गुर्जर और दलित मतदाता चुनावी नतीजे तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। संगीत सोम के लिए ठाकुर वोट मजबूत आधार माना जाता है, लेकिन जाट और गुर्जर वोटों का समर्थन भी उनके लिए काफी महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर अतुल प्रधान को मुस्लिम, गुर्जर और दलित समीकरण का फायदा मिलने की उम्मीद है। बसपा ने जाट उम्मीदवार उतारकर इस पूरे समीकरण को और उलझा दिया है।

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