स्वामी अवधेशानंद जी गिरि जी

यह मंत्र आत्मा के उस प्रकाश की अनुभूति है, जो न भीतर है, न बाहर — वह सर्वत्र है

श्रीसद्गुरु आशीषवचनम्
— “प्रभुश्री की लेखनी से” —
11 जुलाई, 2025 (शुक्रवार)

“यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्यैष महिमा भुवि।
दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठितः॥
मनोमयः प्राणशरीरनेता
प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय ।
तद् विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा
आनन्दरूपममृतं यद् विभाति ॥”
– मुण्डकोपनिषद् २.२.७

मुण्डकोपनिषद् के इस दिव्य मंत्र में आत्मा की सर्वज्ञता, सर्वविद्यता, अदृश्य प्रतिष्ठा और आनन्दरूप अमृतस्वरूप का विराट उद्घाटन है। यह श्लोक आत्मा को ब्रह्मरूप में प्रकट करते हुए, उसके हृदय में प्रतिष्ठित रहस्य को दर्शाता है — और यह कि विवेकशील योगी (धीरा) उसे कैसे अनुभव करते हैं।

“यः सर्वज्ञः सर्वविद्” भगवद्पादाचार्य आद्य शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि यह आत्मा न केवल सर्वज्ञ (जो सब कुछ जानता है) है, अपितु सर्ववित् (जो सबको जानता है) भी है। यह गुण केवल ब्रह्म को ही प्राप्त हैं, अतः आत्मा ही ब्रह्म है — यह अद्वैत का प्रत्यक्ष संकेत है।

“यस्यैष महिमा भुवि” — यह जगत, इसकी लीला, चेतना, गति — सब उसी आत्मा की महिमा है। यह ब्रह्म की विभूति है, उससे भिन्न नहीं।

“दिव्ये ब्रह्मपुरे… आत्मा प्रतिष्ठितः” — शरीर को ब्रह्मपुर कहा गया है — एक दिव्य नगर। हृदयगुहा को आकाशतुल्य व्योम कहा गया है, जहाँ यह आत्मा प्रतिष्ठित है। यह बाह्य नहीं, आंतरिक अनुभूति का विषय है।

“मनोमयः प्राणशरीरनेता” — यह आत्मा मनोमय है — मन से भी सूक्ष्म। प्राणशरीरनेता — वह समस्त प्राणक्रियाओं का नियंता है। शंकराचार्य इसे आत्मा की सर्वव्यासित सत्ता का द्योतक मानते हैं।

“प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय” — यह आत्मा अन्नमय कोश (शरीर) में हृदय के समीप प्रतिष्ठित है — वह समीप है, किन्तु स्थूल दृष्टि से परे।

“तद् विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा” —
यह आत्मा केवल ज्ञान से नहीं, विज्ञान — अर्थात् साक्षात्कारी अनुभूति से ही धीरा — विवेकी, समाधिस्थ साधक — अनुभव करते हैं।

“आनन्दरूपममृतं यद्विभाति” —
और जो आत्मा इस अनुभव में प्रकट होती है, वह है — आनन्दरूप, अमृतस्वरूप और स्वप्रकाश। न वह किसी इन्द्रिय से देखा जाता है, न किसी शब्द से जाना जाता है — वह केवल प्रकाशमान आनुभविक तत्त्व है।

यह मंत्र अद्वैत वेदान्त की महायात्रा का उत्कर्ष है । आत्मा और ब्रह्म भिन्न नहीं।आत्मा ही सृष्टि का कारण, नियंत्रणकर्ता और साक्षी है। आत्मा का निवास बाहर नहीं, हृदयगुहा में है। वह साक्षी, प्रेरक, प्रकाशक और आनन्दरूप है। उसका बोध तर्क से नहीं, विज्ञान- अनुभवसिद्ध साक्षात्कार-से होता है।

यह मंत्र आत्मा के उस प्रकाश की अनुभूति है, जो न भीतर है, न बाहर — वह सर्वत्र है, परन्तु उसके हृदयगुहा में प्रतिष्ठित अनुभव से ही अमृतस्वरूप का प्रकाश मिलता है।
धीरा — जो स्थिरबुद्धि हैं, ॐ के ध्यान से, ज्ञान और वैराग्य से — उस आनन्दरूप अमृत आत्मा का साक्षात्कार करते हैं।
यही अद्वैत का पथ है – और यही उसका पूर्ण बोध भी।

 

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