स्वामी अवधेशानंद जी गिरि जी

वेदान्त दर्शन का केन्द्रीय उद्देश्य है- आत्मा और ब्रह्म के ऐक्य का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करना

वेदान्त दर्शन का केन्द्रीय उद्देश्य है – आत्मा और ब्रह्म के ऐक्य का प्रत्यक्ष अनुभव। उपनिषदों में यह उद्घोष बार-बार आता है कि केवल आत्मबोध ही जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर सकता है। मुण्डकोपनिषद् का यह मंत्र इसी सत्य को अत्यंत गूढ़, किन्तु स्पृहणीय शैली में व्यक्त करता है। यह न केवल अज्ञानियों की स्थिति पर करुण दृष्टि डालता है, अपितु एक प्रकार की आध्यात्मिक चेतावनी भी है — कि जीवन का लक्ष्य आत्मबोध है, न कि कर्मजन्य स्वर्ग या लौकिक उपलब्धियाँ।

इस मंत्र में उपनिषद का ऋषि कहता है कि जो जन अनेक प्रकार की गतिविधियों, कर्मों और विचारों में डूबे रहते हैं — वे ‘अविद्या’ अर्थात् आत्मबोध-रहित जीवन में विचरण कर रहे हैं। वे बालकवत् (अल्पबुद्धि) हैं, जो यह मान लेते हैं कि वे कृतार्थ हो गए — अर्थात् जीवन का उद्देश्य प्राप्त कर लिया। किन्तु यह केवल मोहवश उत्पन्न भ्रांति है।

भगवद्पाद आद्य शंकराचार्य इस मंत्र की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि यहाँ ‘बालाः’ शब्द ज्ञान में अपरिपक्व जनों के लिए प्रयुक्त है, जो कर्मों में फँसे रहकर स्वयं को पूर्ण मानते हैं। यह अभिमान; मैं कृतार्थ हूँ’ ही बन्धन का कारण है।

‘यत् कर्मिणः न प्रवेदयन्ति रागात्’ — कर्मकाण्ड में रत साधक, राग-द्वेष से प्रेरित होकर आत्म-तत्त्व को नहीं जान पाते। वे यज्ञ, दान, व्रत आदि के फलस्वरूप क्षणिक स्वर्ग को तो पा लेते हैं, परन्तु वह भी पुण्य क्षीण होने पर छिन जाता है।

‘तेन आतुराः क्षीणलोकाः च्यवन्ते’ — जब पुण्य समाप्त हो जाता है, तब वे फिर इस मृत्युलोक में जन्म लेकर संसार चक्र में भटकते हैं। यह ‘आतुरता’ केवल शारीरिक नहीं, आत्मिक व्यग्रता और तृष्णा की स्थिति है।

यह मंत्र स्पष्ट करता है कि केवल कर्मकाण्ड से मुक्ति नहीं मिलती। यद्यपि यज्ञ-दान-व्रत आदि जीवन को शुद्ध करते हैं, परन्तु वे मोक्ष का अंतिम साधन नहीं हैं। आत्मज्ञान ही मुक्ति का एकमात्र उपाय है।

“कर्मणा न प्राप्यते मोक्षः, ज्ञानात् एव तु मुच्यते” कर्म से नहीं, ज्ञान से ही मुक्ति सम्भव है। यहाँ ‘ज्ञान’ से तात्पर्य केवल शास्त्रज्ञता नहीं,अपितु आत्मा और ब्रह्म के अभेद स्वरूप का साक्षात् अनुभव है।

इस मंत्र के माध्यम से उपनिषद् हमें बाह्य उपलब्धियों और कर्मफल की सीमाओं से परिचित कराता है। यह स्पष्ट करता है कि जब तक मनुष्य स्वयं को शरीर, नाम, कर्म और लोकोत्तर फलों तक सीमित समझता है, वह ‘कृतार्थ’ नहीं हुआ है।

वास्तव में कृतार्थता का अर्थ है — आत्मा का बोध, ब्रह्म के साथ एकत्व का अनुभव, और पुनर्जन्म के बन्धन से विमुक्ति।
यह मंत्र हमें आह्वान करता है कि जीवन को कर्म में नहीं, बोध में पूर्णता दें। यही वेदान्त का सन्देश है, यही उपनिषदों की पुकार है।

 

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