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सपा के गढ़ मुरादाबाद में रालोद की हुंकार: क्या जयंत का ‘हैंडपंप’ बदलेगा पश्चिमी यूपी के समीकरण?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुरादाबाद मंडल को हमेशा से समाजवादी पार्टी का एक मजबूत और अभेद्य गढ़ माना जाता रहा है। मुस्लिम और पिछड़े वर्ग के बाहुल्य वाले इस इलाके में विपक्षी दलों के लिए पैठ बनाना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों ने इस पारंपरिक समीकरण में एक नया मोड़ ला दिया है।

भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी दल राष्ट्रीय लोकदल ने अब इस क्षेत्र में अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। इस सिलसिले में ठाकुरद्वारा में होने वाली एक विशाल रैली में केंद्रीय मंत्री और रालोद के मुखिया जयंत चौधरी खुद हुंकार भरने आ रहे हैं। इस रैली को लेकर न केवल रालोद कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह है, बल्कि पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है।

रालोद की नजरें विशेष रूप से मुरादाबाद मंडल की उन विधानसभा सीटों पर टिकी हैं, जहां भाजपा लंबे समय से जीत का स्वाद चखने के लिए तरस रही है। मुरादाबाद, ठाकुरद्वारा, कांठ और मुरादाबाद ग्रामीण जैसी सीटों पर भाजपा का प्रदर्शन पिछले कुछ चुनावों में बहुत खास नहीं रहा है। पिछले चुनाव के नतीजों को देखें तो मुरादाबाद जिले की छह विधानसभा सीटों में से भाजपा केवल मुरादाबाद नगर सीट पर ही जीत दर्ज कर पाई थी, जबकि बाकी पांच सीटें सपा के खाते में चली गई थीं।

ऐसे में रालोद के रणनीतिकारों का मानना है कि जिन सीटों पर भाजपा कमजोर है, वहां गठबंधन के तहत रालोद को मौका मिलना चाहिए। रालोद वहां अपनी गुंजाइश तलाश रही है जहां उसके आगे बढ़ने से सहयोगी दल भाजपा को भी कोई आपत्ति न हो। दोनों दल मिलकर एक ऐसी जुगत में लगे हैं जिससे इस राजनीतिक रूप से ‘बंजर’ मानी जाने वाली भूमि को उपजाऊ बनाया जा सके।

साल 2022 के विधानसभा चुनाव में रालोद ने सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था लेकिन राजनीति में स्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जयंत चौधरी ने करवट बदली और भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन में शामिल हो गए। आज जयंत चौधरी केंद्र सरकार में मंत्री हैं।

रालोद के स्थानीय और वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि मुरादाबाद और आस-पास के क्षेत्रों से किसान मसीहा पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी अजित चौधरी का बेहद गहरा और भावनात्मक नाता रहा है। अब उसी पुरानी परिपाटी और विरासत को आगे बढ़ाने के लिए जयंत चौधरी खुद मैदान में उतर रहे हैं। इस रैली का एक मुख्य उद्देश्य अपने मूल मतदाताओं को ये संदेश देना है कि राष्ट्रीय लोकदल अभी भी पूरी तरह सक्रिय है और अपने कार्यकर्ताओं के मान-सम्मान के लिए काम कर रही है।

इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य में एक नया और बेहद दिलचस्प मोड़ पूर्व विधायक विजय यादव के रूप में आया है। साल 2007 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर ठाकुरद्वारा से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचने वाले विजय यादव का रालोद से जुड़ना एक गहरे राजनीतिक समीकरण की ओर इशारा करता है। जानकार इसे रालोद और भाजपा गठबंधन की एक दूरगामी सियासत के रूप में देख रहे हैं।

ठाकुरद्वारा seat पर जहां भाजपा को हमेशा मुश्किलों का सामना करना पड़ता था, वहां विजय यादव जैसे कद्दावर स्थानीय चेहरे के माध्यम से गठबंधन के समीकरण बिठाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। रालोद की मुख्य नजर इस समय ठाकुरद्वारा के अलावा कांठ और मुरादाबाद ग्रामीण सीट पर टिकी है। इन क्षेत्रों में रालोद अपना पारंपरिक वोट बैंक मानती है। भले ही पिछले चुनाव में रालोद यहां सीधे तौर पर नहीं जीती थी, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में पार्टी नेताओं की सोच है कि भाजपा अपनी लगातार हारी हुई सीटों पर रालोद के प्रत्याशी को अवसर दे सकती है, जिससे दोनों दलों को फायदा होगा।
इस रैली को ऐतिहासिक रूप से सफल बनाने के लिए रालोद कोटे से योगी कैबिनेट में मंत्री बने अनिल कुमार, जो इस क्षेत्र के प्रभारी मंत्री भी हैं, खुद मुरादाबाद में डेरा डाले हुए हैं। वो सरकार के प्रतिनिधि के रूप में लगातार क्षेत्र का दौरा कर रहे हैं और सघन जनसंपर्क अभियानों के जरिए कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ा रहे हैं।

मुरादाबाद जैसे समाजवादी गढ़ में जयंत चौधरी की ये रैली आने वाले समय में क्या गुल खिलाएगी, ये तो पूरी तरह से भविष्य के गर्भ में है। क्या भाजपा और रालोद का ये नया समीकरण सपा के किले में सेंध लगा पाएगा? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब वक्त ही देगा। लेकिन एक बात तो साफ है कि इस रैली ने मुरादाबाद की स्थानीय राजनीति में हलचल जरूर पैदा कर दी है। रालोद के कार्यकर्ताओं का जोश चरम पर है और उन्हें पूरी उम्मीद है कि इस बार रालोद के ‘हैंडपंप’ से मुरादाबाद की राजनीतिक धरती पर विजय श्री का जल जरूर निकलेगा।

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