अंबाला में हुई एक तेज़ बारिश ने नगर निगम की तैयारियों की पोल खोल कर रख दी। पूरे शहर में जगह-जगह पानी भर गया, सड़कें तालाब बन गईं। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पानी निकालने के लिए पूरे शहर में 42 पंप सेट लगाए गए हैं, वहां एक भी पंप समय पर चालू नहीं किया गया। इस मामले पर अंबाला की मेयर शैलजा सचदेवा ने नगर निगम के अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने साफ कहा कि यह कोई तकनीकी गलती नहीं, बल्कि अधिकारियों की सोची-समझी मनमानी और साजिश है। उनका आरोप है कि जानबूझकर पंप नहीं चलाए गए ताकि शहर में बाढ़ जैसे हालात बनें और सरकार व मेयर की छवि को नुकसान पहुंचे। उन्होंने कहा, “कुछ अधिकारी न तो जनहित में सोच रहे हैं और न ही जिम्मेदारी निभा रहे हैं। वो सिर्फ राजनीति कर रहे हैं।”
अधिकारियों की लापरवाही से हुआ जलभराव: मेयर
मेयर के पति और मनोनीत पार्षद संदीप सचदेवा ने भी इसी बात को दोहराते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि अधिकारी उनकी बात सुनने को तैयार नहीं हैं। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि जनता के साथ विश्वासघात है। अगर शहर में तैनात 42 पंपों में से एक भी समय पर चल जाता, तो लोगों को 6-8 घंटे की जलभराव की परेशानी से नहीं गुजरना पड़ता। यह पहली बार नहीं है जब प्रशासन ने चेतावनियों को नजरअंदाज किया हो। हर साल मानसून से पहले नगर निगम को नालों की सफाई, पंपों की जांच और जलनिकासी व्यवस्था को दुरुस्त करने के आदेश दिए जाते हैं। लेकिन जब समय आता है, तो अधिकारी या तो दूसरों पर जिम्मेदारी टालते हैं या खुद को बचाने के लिए झूठे बहाने बना लेते हैं।
पंप चालू करवाने के लिए मेयर को फोन करना पड़ा
मेयर को खुद पंप चालू करवाने के लिए अधिकारियों को फोन करना पड़ा, उसके बाद जाकर कुछ इलाकों में पंप चालू हुए। लेकिन तब तक कई मोहल्लों में पानी भर चुका था, दुकानों का सामान भीग चुका था और यातायात पूरी तरह बाधित हो चुका था। नगर निगम कमिश्नर वीरेंद्र लाठर का कहना है कि उन्हें मेयर का फोन आने के बाद ही पंप चालू करवाए गए। सवाल उठता है , क्या अधिकारी खुद से अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते? क्या किसी शहर की सेवा करने के लिए उन्हें हर बार ऊपर से दबाव देना पड़ेगा? यह पूरे सिस्टम की नाकामी और अकर्मण्यता का साफ संकेत है। जब जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग खुद को जवाबदेह मानने के बजाय राजनीतिक चालों का हिस्सा बन जाएं, तो सबसे ज्यादा नुकसान जनता को होता है। जनता जो टैक्स देती है, वोट देती है, वही बार-बार प्रशासन की लापरवाही और अधिकारियों की मनमानी की कीमत चुका रही है।
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