उत्तर प्रदेश

Seal in Sravasti: श्रावस्ती में सील पर बोलीं मायावती, “सरकार निजी मदरसों के खिलाफ नहीं”, “अफसरों की मनमानी से हुआ है विवाद”

Seal in Sravasti: श्रावस्ती में सील पर बोलीं मायावती

श्रावस्ती जिले में प्रशासन की ओर से एक मदरसे को सील किए जाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसले को बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने महत्वपूर्ण और समयोचित बताया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि केवल सरकारी मान्यता न होना किसी मदरसे को बंद करने का आधार नहीं हो सकता। इसी आधार पर अदालत ने श्रावस्ती में सील किए गए मदरसे की सील 24 घंटे के भीतर हटाने के निर्देश दिए थे। इस फैसले के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेज हो गई है।

बसपा प्रमुख मायावती ने हाईकोर्ट के इस आदेश का स्वागत करते हुए जिला प्रशासन और अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने इस संबंध में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट साझा की, जिसमें उन्होंने अदालत के फैसले को अति-महत्वपूर्ण और सामयिक बताया। मायावती ने लिखा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ द्वारा दिया गया यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से अहम है, बल्कि इससे उन लोगों को भी राहत मिली है, जो प्रशासनिक फैसलों से प्रभावित हुए हैं।

अपने बयान में मायावती ने कहा कि संभवतः देश में कोई भी सरकार नीतिगत रूप से प्राइवेट मदरसों के खिलाफ नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि ऐसी घटनाएं अक्सर जिला स्तर पर अधिकारियों की मनमानी या जल्दबाजी के कारण सामने आती हैं। उन्होंने कहा कि श्रावस्ती का मामला भी इसी तरह का प्रतीत होता है, जहां प्रशासन ने बिना पर्याप्त कानूनी आधार के मदरसे को सील कर दिया। मायावती के अनुसार, इस तरह की अप्रिय घटनाओं से न केवल समाज में भ्रम पैदा होता है, बल्कि सरकार की छवि पर भी असर पड़ता है।

पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि जिला स्तर पर लिए जाने वाले ऐसे फैसलों पर सरकार को गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए, ताकि भविष्य में इस प्रकार की स्थितियां उत्पन्न न हों। उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों को नसीहत दी कि किसी भी संवेदनशील विषय पर कार्रवाई करने से पहले कानून और न्यायिक प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किया जाना चाहिए।

मदरसे के मुद्दे के अलावा मायावती ने संसद और राज्य विधानसभाओं की कार्यप्रणाली को लेकर भी चिंता जाहिर की है। उन्होंने कहा कि देश में संसद और राज्यों के विधानमंडलों के सत्रों की अवधि लगातार कम होती जा रही है, जो लोकतंत्र के लिए एक गंभीर संकेत है। उन्होंने यह भी कहा कि सत्रों के दौरान बार-बार हंगामा, कार्यवाही का स्थगन और व्यवधान के कारण जनहित से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा नहीं हो पाती।

बसपा प्रमुख ने अपने ‘एक्स’ पोस्ट में लिखा कि संसद और विधानमंडलों की कार्यवाही का समय घटने के साथ-साथ हर बार भारी हंगामे और स्थगन के चलते इनकी जन-उपयोगिता कम होती जा रही है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक बताया और कहा कि इस पर सरकार और विपक्ष दोनों को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

मायावती ने लखनऊ में आयोजित हो रहे पीठासीन अधिकारियों के 86वें अखिल भारतीय सम्मेलन का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन के दौरान विधानमंडलों की कार्यवाही के लगातार घटते समय पर चिंता व्यक्त किया जाना उचित और सराहनीय कदम है। उनके अनुसार, यह विषय केवल सरकार या विपक्ष का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे से जुड़ा हुआ है।

चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती ने कहा कि संसद और विधानमंडलों की कार्यवाही साल में कम से कम 100 दिन चलनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि कार्यवाही निर्धारित कैलेंडर के अनुसार और नियमों के तहत शांतिपूर्ण तरीके से होनी चाहिए, ताकि जनता से जुड़े मुद्दों पर सार्थक चर्चा संभव हो सके। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह बेहद जरूरी है कि विधायी संस्थाएं प्रभावी ढंग से काम करें।

लखनऊ में आयोजित पीठासीन अधिकारियों का 86वां अखिल भारतीय सम्मेलन 19 जनवरी को शुरू हुआ था, जो 21 जनवरी तक चलेगा। इस सम्मेलन में देशभर से लोकसभा, राज्यसभा और विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं के पीठासीन अधिकारी शामिल हुए हैं। सम्मेलन के दौरान विधानमंडलों की कार्यवाही, नियमों के पालन और सत्रों की अवधि जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की जा रही है।

मायावती के इन बयानों को आगामी राजनीतिक परिदृश्य के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक ओर उन्होंने मदरसे से जुड़े मामले में न्यायपालिका के फैसले का समर्थन किया, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक कार्यशैली और लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाकर सरकार और विपक्ष दोनों को आईना दिखाने की कोशिश की है।

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