Saffron-e-hind: भारत न 'भगवा-ए-हिंद' बनेगा, न 'गजवा-ए-हिंद'!
देश में बढ़ती राजनीतिक गर्मी और चुनावी सरगर्मी के बीच धार्मिक बयानों का दौर भी तेज हो गया है। हाल ही में दो प्रमुख कथावाचकों—धीरेंद्र शास्त्री और रामभद्राचार्य—के ‘हिंदू राष्ट्र’ (Saffron-e-hind) संबंधी बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए आल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी (Saffron-e-hind) ने स्पष्ट किया कि भारत न कभी ‘भगवा-ए-हिंद’ (Saffron-e-hind) बनेगा और न ही ‘गजवा-ए-हिंद’। भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है और हमेशा रहेगा।
मौलाना रजवी ने सोमवार को एक वीडियो बयान जारी कर कहा कि कुछ कथावाचक देश के माहौल और मौसम के हिसाब से बयान देते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाले ये बयान राजनीतिक फायदे के लिए दिए जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य समाज में ध्रुवीकरण (Saffron-e-hind) पैदा करना है।
मौलाना ने कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री (Saffron-e-hind) के उस बयान पर निशाना साधा जिसमें उन्होंने कहा था कि “अगर भारत हिंदू राष्ट्र (Saffron-e-hind) बना, तो बिहार पहला हिंदू राज्य होगा।” मौलाना ने कहा कि शास्त्री के इस बयान का सीधा संबंध बिहार में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से है। “यह चुनावी सियासत है, जिसमें कुछ धार्मिक चेहरों को मोहरा बनाया जा रहा है,” मौलाना ने कहा।
उन्होंने दावा किया कि धीरेंद्र शास्त्री पिछले दो वर्षों से इस प्रकार के विचार सामने रख रहे हैं, लेकिन भारत की जनता ने उन्हें व्यापक समर्थन नहीं दिया। “उनका यह अभियान पहले ही असफल हो चुका है। जनता जानती है कि देश को धर्म के आधार पर नहीं, संविधान के आधार पर चलाया जाना चाहिए,” उन्होंने कहा।
रामभद्राचार्य द्वारा दिए गए ‘भगवा-ए-हिंद’ (Saffron-e-hind) के बयान पर भी मौलाना रजवी ने कड़ा ऐतराज़ जताया। उन्होंने कहा कि कथावाचक ने यह बयान इस तर्क पर दिया कि जब देश में 80% हिंदू आबादी हो जाएगी, तब भारत को भगवा राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए। मौलाना ने इस पर पलटवार करते हुए कहा, “शायद उन्हें यह जानकारी नहीं है कि भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश की मुस्लिम आबादी लगभग 19% है, जबकि 81% गैर-मुस्लिम आबादी है। इन आंकड़ों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना राष्ट्रहित में नहीं है।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि ‘भगवा-ए-हिंद’ (Saffron-e-hind) का नारा ‘गजवा-ए-हिंद’ के मुकाबले में दिया गया है, जबकि भारत के मुसलमान पहले ही इस्लामी कट्टरपंथी विचार ‘गजवा-ए-हिंद’ को खारिज कर चुके हैं। “हम भारतीय मुसलमान इस देश के लोकतांत्रिक ढांचे में विश्वास रखते हैं, और हर तरह के मजहबी उन्माद को नकारते हैं,” मौलाना ने दोहराया।
मौलाना रजवी ने चिंता जताई कि इन कथावाचकों के बयानों से देश में कट्टरपंथ को बढ़ावा मिल रहा है। उन्होंने कहा, “जब एक तरफ गजवा-ए-हिंद जैसे नारों की आलोचना होती है, तो दूसरी तरफ ‘भगवा-ए-हिंद’ (Saffron-e-hind) जैसे नारे देने वालों को बढ़ावा देना कैसे तर्कसंगत हो सकता है? आखिर इनमें फर्क क्या रह जाता है?”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस तरह की बयानबाजी से न सिर्फ भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि खराब होती है, बल्कि इससे समाज में फूट और अविश्वास की खाई गहरी होती है। “धर्मगुरु अगर समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम करेंगे, तो लोकतंत्र को गंभीर खतरा होगा,” उन्होंने चेतावनी दी।
मौलाना रजवी ने दो टूक कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और इसे न कभी हिंदू राष्ट्र बनाया जा सकता है, न ही कोई इस्लामी राष्ट्र बना सकता है। “भारत का संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है, और यही इसकी खूबसूरती है। हम सबको मिलकर इसी संविधान की रक्षा करनी है।”
उन्होंने सभी धर्मगुरुओं और राजनेताओं से अपील की कि वे चुनावों को धर्म से जोड़ने की कोशिश न करें। “धर्म का काम लोगों को जोड़ना है, चुनावी फायदे के लिए धार्मिक भावनाओं से खेलना बेहद खतरनाक खेल है,” मौलाना ने कहा।
मौलाना रजवी का यह बयान ऐसे समय पर आया है जब देश में विभिन्न राज्यों में विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू हो चुकी है।
ऐसे में धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों को हवा देना लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। भारत की विविधता इसकी ताकत है, और उसे बनाए रखना सभी नागरिकों की जिम्मेदारी है।
धार्मिक बयानों की आड़ में राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा देना न केवल संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि इससे देश की एकता और अखंडता (Saffron-e-hind) भी खतरे में पड़ सकती है।
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