देश

देश किस दिशा में जा रहा है?

लेखक: दीपक अरोड़ा

आज 2 अक्टूबर है—महात्मा गांधी की जयंती। वह दिन, जब हमें सत्य, अहिंसा, लोकतांत्रिक संवाद और असहमति का सम्मान याद करना चाहिए। लेकिन इसी दिन देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन हो रहे हैं। दिल्ली में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन हुआ है, जबकि मुंबई में भी विरोध-प्रदर्शन का आह्वान किया गया। इन प्रदर्शनों के केंद्र में मतदाता सूचियों के Special Intensive Revision यानी SIR और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल हैं।

यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि प्रदर्शन में कौन खड़ा है। सवाल यह है कि आखिर जनता के मन में सवाल क्यों पैदा हो रहे हैं? लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक आधार जनता का विश्वास है—यह विश्वास कि उसका वोट सुरक्षित है, मतदाता सूची निष्पक्ष है और चुनाव कराने वाली संस्था पर किसी भी राजनीतिक दल का प्रभाव नहीं है।

आज विपक्ष और कुछ नागरिक संगठन चुनावी प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप लगा रहे हैं। दूसरी तरफ चुनाव आयोग का अपना पक्ष है कि मतदाता सूची की समीक्षा का उद्देश्य डुप्लीकेट, अपात्र या गलत प्रविष्टियों को हटाना और सूची को अधिक शुद्ध करना है। इसलिए आरोप और प्रमाण—दोनों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

यही वह जगह है जहां देश को शोर से ज्यादा जवाब चाहिए। अगर चुनाव आयोग के खिलाफ लगाए जा रहे आरोप गलत हैं, तो उन्हें तथ्यों के साथ खारिज किया जाना चाहिए। अगर प्रक्रिया में कहीं वास्तविक कमी है, तो उसे स्वीकार करके सुधार किया जाना चाहिए। और अगर कहीं मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो उस नागरिक को प्रभावी और समयबद्ध तरीके से अपनी बात रखने का रास्ता मिलना चाहिए।

क्योंकि एक नागरिक के लिए उसका वोट सिर्फ एक नंबर नहीं है। वह उसकी लोकतांत्रिक हिस्सेदारी है। लेकिन दूसरी तरफ विरोध करने वालों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। सरकार या संवैधानिक संस्था पर सवाल उठाना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन आरोपों को तथ्य से अलग नहीं किया जा सकता। विरोध लोकतांत्रिक हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र में आरोप के साथ प्रमाण और मांग के साथ समाधान भी होना चाहिए।

आज दिल्ली में प्रदर्शन को लेकर पुलिस ने अनुमति नहीं दी और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई। कुछ नेताओं और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की खबरें भी सामने आई हैं।

यहां भी एक बड़ा सवाल है—

क्या लोकतंत्र में असहमति के लिए पर्याप्त जगह बची रहनी चाहिए?

इसका उत्तर होना चाहिए—हाँ।

लेकिन उसी के साथ दूसरा उत्तर भी उतना ही स्पष्ट होना चाहिए—

असहमति का अधिकार कानून और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर होना चाहिए। देश तभी मजबूत होता है जब सत्ता सवाल सुनने का धैर्य रखती है और विपक्ष सवाल पूछने की जिम्मेदारी समझता है। आज समस्या सिर्फ यह नहीं है कि देश में प्रदर्शन हो रहे हैं। असली चिंता तब शुरू होती है जब समाज दो हिस्सों में बंटने लगे—एक तरफ वे लोग जिन्हें हर सरकारी निर्णय सही दिखाई दे और दूसरी तरफ वे लोग जिन्हें हर सरकारी निर्णय गलत।

सच्चाई अक्सर इन दोनों अतियों के बीच होती है। हमें यह भी देखना होगा कि क्या राजनीतिक दल जनता के वास्तविक सवालों को अपनी राजनीति का हिस्सा बना रहे हैं या जनता के सवालों को राजनीति के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। और सत्ता को भी यह समझना होगा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल उठना अपने आप में लोकतंत्र के खिलाफ नहीं है। बल्कि कई बार सवालों का जवाब देना ही संस्थाओं में विश्वास मजबूत करता है।

आज गांधी जयंती पर शायद हमें यही तय करना होगा कि हमें ऐसा भारत चाहिए जहां सवाल पूछने वाला देशद्रोही न कहलाए और जवाब मांगने वाला विरोधी न माना जाए।

हमें ऐसा भारत चाहिए जहां चुनाव जीतना महत्वपूर्ण हो, लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो—चुनाव प्रक्रिया पर जनता का विश्वास।

हमें ऐसा भारत चाहिए जहां सरकार मजबूत हो, लेकिन जवाबदेह भी।

जहां विपक्ष मुखर हो, लेकिन जिम्मेदार भी।

जहां मीडिया सवाल पूछे, लेकिन तथ्यों के साथ।

और जहां नागरिक किसी राजनीतिक दल के समर्थक होने से पहले भारत के नागरिक हों।

आज देश एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है।

यह मोड़ हमें किस दिशा में ले जाएगा, यह केवल सरकार या विपक्ष तय नहीं करेंगे।

इसे तय करेंगे—हमारे संस्थान, हमारी राजनीतिक संस्कृति, हमारा मीडिया और सबसे बढ़कर हम नागरिक।

इसलिए आज सवाल किसी एक व्यक्ति, एक पार्टी या एक संस्था से बड़ा है—

क्या हम ऐसा लोकतंत्र बना रहे हैं जिसमें असहमति के बावजूद विश्वास बचा रहे?

क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं कि उसमें कोई विरोध नहीं होता।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह है कि विरोध के बावजूद व्यवस्था पर विश्वास कायम रहता है।

और अगर कहीं वह विश्वास कमजोर हो रहा है, तो उसे नारे से नहीं—
पारदर्शिता, तथ्य, जवाबदेही और संवाद से मजबूत करना होगा।

यही आज के भारत की सबसे बड़ी जरूरत है।

दीपक अरोड़ा

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