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भारत को फिर से आंख दिखाने लगा ‘चीन’ ! लेकिन, इस बार न सीमा विवाद, न सैन्य विवाद… जानिए क्या है मामला ?

भारत और चीन के रिश्तों में एक बार फिर नया तनाव पैदा होता दिखाई दे रहा है। इस बार मुद्दा सीमा विवाद, सैनिक टकराव या व्यापार नहीं, बल्कि तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा और उनके उत्तराधिकारी का है। चीन ने भारत को सीधी चेतावनी देते हुए कहा है कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी के मामले से दूर रहे, क्योंकि यह पूरी तरह चीन का “आंतरिक मामला” है।

नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास की ओर से जारी इस बयान ने एक बार फिर दोनों देशों के बीच पुराने विवादों को हवा दे दी है। चीन की तरफ से प्रवक्ता यू जिंग ने साफ शब्दों में कहा कि दलाई लामा के पुनर्जन्म और उत्तराधिकारी का फैसला सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के तहत होता है, जिसमें चीन की केंद्रीय सरकार की मंजूरी जरूरी है।

दरअसल, यह बयान ऐसे समय आया है जब दलाई लामा लगातार सार्वजनिक मंचों से यह कह रहे हैं कि उनके उत्तराधिकारी के चयन में चीन की कोई भूमिका नहीं होगी। यही बात अब बीजिंग को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है। तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु 14वें दलाई लामा पिछले कई दशकों से भारत में रह रहे हैं।

1959 में तिब्बत से पलायन के बाद उन्होंने भारत में शरण ली थी और तब से हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में तिब्बती सरकार-इन-एक्साइल यानी सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन का संचालन होता है। चीन हमेशा से दलाई लामा को अलगाववादी नेता मानता रहा है, जबकि दुनियाभर में उन्हें शांति और करुणा का प्रतीक माना जाता है।

अब असली विवाद उनके उत्तराधिकारी को लेकर खड़ा हो गया है। चीन चाहता है कि अगला दलाई लामा उसकी मंजूरी से चुना जाए, ताकि तिब्बत पर उसका नियंत्रण मजबूत बना रहे। लेकिन दलाई लामा पहले ही साफ कर चुके हैं कि उनका अगला अवतार किसी स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश में भी जन्म ले सकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिए हैं कि चीन को इस प्रक्रिया में कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।

यही वजह है कि चीन लगातार भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। चीनी प्रवक्ता यू जिंग ने अपने बयान में भारत से यह मांग भी की कि उसकी जमीन का इस्तेमाल “तिब्बत की आजादी” की गतिविधियों के लिए न होने दिया जाए। चीन ने यह भी कहा कि सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन को दुनिया का कोई संप्रभु देश मान्यता नहीं देता, इसलिए उसे उत्तराधिकारी चुनने का अधिकार नहीं है।

बीजिंग का यह बयान केवल धार्मिक मुद्दा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके पीछे गहरी रणनीतिक और राजनीतिक चिंता भी छिपी हुई है। क्योंकि तिब्बत का मुद्दा चीन के लिए बेहद संवेदनशील है। चीन को डर है कि अगर अगला दलाई लामा उसकी पकड़ से बाहर चुना गया, तो तिब्बती आंदोलन को नई ताकत मिल सकती है।

गौर करने वाली बात यह भी है कि चीन पहले भी कई बार इस मुद्दे पर भारत को चेतावनी दे चुका है। पिछले साल जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14वें दलाई लामा को उनके 90वें जन्मदिन पर शुभकामनाएं दी थीं, तब भी चीन ने कड़ी आपत्ति जताई थी। उस समय चीनी दूतावास ने दलाई लामा के मुद्दे को भारत-चीन संबंधों के बीच “कांटा” तक बता दिया था।
चीन की बेचैनी उस वक्त और बढ़ गई थी जब केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने एक बयान में कहा था कि दलाई लामा के अनुयायी चाहते हैं कि तिब्बती आध्यात्मिक गुरु अपना उत्तराधिकारी खुद चुनें। हालांकि रिजिजू ने बाद में स्पष्ट किया था कि यह उनकी व्यक्तिगत राय है, भारत सरकार की आधिकारिक नीति नहीं।

लेकिन चीन इन बयानों को बेहद गंभीरता से ले रहा है। बीजिंग को लगता है कि भारत तिब्बत के मुद्दे को एक रणनीतिक कार्ड की तरह इस्तेमाल कर सकता है। खासकर तब, जब दोनों देशों के बीच लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश को लेकर सीमा विवाद पहले से ही जारी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि दलाई लामा का उत्तराधिकारी सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। तिब्बत एशिया की राजनीति में एक अहम केंद्र है और दलाई लामा की लोकप्रियता चीन के लिए हमेशा चुनौती रही है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आने वाले समय में दलाई लामा के उत्तराधिकारी का मुद्दा भारत-चीन संबंधों में नया तनाव पैदा करेगा? क्योंकि यह सिर्फ धर्म का मामला नहीं, बल्कि एशिया की राजनीति, रणनीति और शक्ति संतुलन से जुड़ा एक बड़ा सवाल बन चुका है।

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