पंजाब

पंजाब में AAP की ग्रामीण इलाकों में मजबूत पकड़, कांग्रेस की कमजोरी का फायदा भी नहीं उठा पाई BJP?

पंजाब में AAP की ग्रामीण इलाकों में मजबूत पकड़

 

पंजाब की राजनीति एक बार फिर चर्चा में है। तरनतारन और लुधियाना के उपचुनावों में BJP के बेहद कमजोर प्रदर्शन ने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

ये पहली बार नहीं है जब पंजाब में BJP को संघर्ष करना पड़ा हो, लेकिन इस बार पार्टी जिस पैमाने पर पीछे दिखाई दी, उसने BJP की रणनीति, जनाधार और भविष्य को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है।

पंजाब में BJP का जनाधार पहले से ही सीमित माना जाता था। राज्य की सियासत वर्षों से अकाली दल, कांग्रेस और हाल के समय में आम आदमी पार्टी (AAP) के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ऐसे में BJP के लिए यहां जगह बनाना हमेशा चुनौती ही रहा है।

लेकिन 2020–21 के किसान आंदोलन के बाद हालात और खराब हो गए। ग्रामीण पंजाब, जहां सिख समुदाय की बड़ी आबादी रहती है, वहां BJP को अविश्वास और असंतोष दोनों का सामना करना पड़ा। यही वजह है कि, आज भी किसान आंदोलन के प्रभाव पंजाब की राजनीति में साफ नजर आते हैं।

ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि, किसान आंदोलन ने पंजाब की राजनीतिक दिशा बदल दी। ये सिर्फ एक मुद्दा नहीं था, बल्कि पूरे पंजाब की भावनाओं से जुड़ा आंदोलन था।

BJP को किसानों की नज़र में केंद्र की पार्टी माना जाता है, जिसने कृषि कानून लेकर उनका भरोसा तोड़ा। हालांकि बाद में सरकार ने कानूनों को वापस ले लिया, लेकिन लोगों के मन में बनी कड़वाहट पूरी तरह नहीं मिट सकी।

यही वजह है कि, गांवों में BJP को आज भी ‘दूरी’ का सामना करना पड़ता है। ग्रामीण इलाकों में प्रचार करने से लेकर बूथ मैनेजमेंट तक, पार्टी कई स्तरों पर कमजोर पड़ी हुई है।

वहीं, पंजाब में सिख वोटर किसी भी पार्टी के लिए निर्णायक माने जाते हैं। BJP के लिए ये चुनौती और बड़ी है, क्योंकि किसान आंदोलन के बाद सिख समुदाय का भरोसा पार्टी से काफी हद तक टूट चुका है।

बीजेपी ने पिछले कुछ समय में सिख नेतृत्व को आगे बढ़ाने की कोशिश जरूर की है, लेकिन जमीनी स्तर पर वे भरोसा अभी भी नहीं बना, जिसकी पार्टी को जरूरत है।
आम आदमी पार्टी ने पिछले कुछ वर्षों में पंजाब में अपना जनाधार तेजी से बढ़ाया है।

खासकर गांवों और गरीब तबके में AAP की पैठ गहरी हुई है। लुधियाना और तरनतारन जैसे इलाकों में AAP ने लगातार संगठन मजबूत किया, लोकल चेहरों को खड़ा किया और लोगों तक पहुंच बनाई।

वहीं BJP संगठनात्मक स्तर पर कमजोर दिखी। पार्टी के पास गांवों में न तो पुराना नेटवर्क है और न ही ऐसे स्थानीय चेहरे जो वोटरों की भावनाओं को समझते हों।

साथ ही कांग्रेस इस समय खुद गुटबाज़ी और नेतृत्व संकट से जूझ रही है। पंजाब कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही है, लेकिन इसका लाभ BJP को नहीं मिल रहा।

राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक, पंजाब के वोटरों ने कांग्रेस का विकल्प तलाशते हुए AAP की ओर रुख किया BJP की ओर नहीं। इसका मतलब साफ है कि, BJP अभी विकल्प की राजनीति में भी अपनी जगह नहीं बना पा रही।

कई बीजेपी नेताओं का मानना है कि, पार्टी की सबसे बड़ी समस्या उसका कमजोर स्थानीय नेतृत्व है। पंजाब में BJP के पास न तो ऐसे लोकप्रिय चेहरे हैं जो राज्यस्तरीय प्रभाव रखते हों, और न ही बूथ स्तर पर मजबूत टीम।

अकाली दल से गठबंधन टूटना भी पार्टी के लिए बड़ा झटका रहा है। क्योंकि वर्षों तक बीजेपी ने पंजाब की राजनीति अकाली दल के साथ मिलकर ही की थी। गठबंधन टूटने के बाद पार्टी का खुद का नेटवर्क बेहद कमजोर निकलकर सामने आया।

तरनतारन और लुधियाना उपचुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि, पंजाब में बीजेपी को अभी लंबा सफर तय करना है। ये सिर्फ चुनावी हार नहीं, बल्कि एक संकेत है कि, पार्टी को अपनी रणनीति, नेतृत्व, ग्रामीण नेटवर्क और सिख समाज से संवाद सब कुछ नए सिरे से बनाना होगा।

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले BJP के पास अभी समय है, लेकिन ये तभी लाभदायक होगा जब पार्टी गहराई से काम करे और अपनी छवि को सुधारने पर फोकस करे।

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