हरियाणा के अहीरवाल क्षेत्र में अब होगी वर्चस्व की जंग
हरियाणा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद राव नरेंद्र सिंह ने अपने स्वागत कार्यक्रमों की शुरुआत रेवाड़ी से की, जिसे राव इंद्रजीत सिंह का गढ़ और गृह क्षेत्र माना जाता है। अपने संबोधन में राव नरेंद्र ने साफतौर पर कहा कि, अहीरवाल जिस पार्टी के साथ रहा, उसी की सरकार बनी है।
उन्होंने अहीरवाल में नए राजनीतिक माहौल की बात करते हुए संकेत दिये कि, अब यहां बीजेपी के कद्दावर नेता राव इंद्रजीत को कड़ी चुनौती मिलेगी। दूसरी ओर, इसका जवाब प्रदेश सरकार की स्वास्थ्य मंत्री और राव इंद्रजीत की बेटी आरती राव ने पंचकूला में दिया। उन्होंने अपने पिता के नेतृत्व को सबसे बड़ा बताते हुए कांग्रेस के इस फैसले को कोई बड़ी चुनौती नहीं माना।
आरती राव ने कहा कि, राव इंद्रजीत सिंह ने 1977 में राजनीति में कदम रखा था। वे चार दशकों तक कांग्रेस में अहीरवाल के सबसे प्रमुख चेहरे बने रहे। रामपुरा हाउस हमेशा इस क्षेत्र की सियासत का केंद्र रहा। 2014 में उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया, जिससे कांग्रेस अहीरवाल में कमजोर पड़ गई। उसी साल दक्षिण हरियाणा की 17 में से 14 सीटें भाजपा ने जीत लीं और विधानसभा में बहुमत हासिल किया। खासकर अहीरवाल बेल्ट की सभी 11 सीटों पर भाजपा का कब्जा हुआ। जिसके बाद भाजपा ने पूरे हरियाणा की कमान संभाली।
2019 के चुनाव में भाजपा को दक्षिण हरियाणा की 17 में से 11 सीटें मिलीं, जबकि अहीरवाल बेल्ट की 3 सीटें कांग्रेस और निर्दलीय के खाते में आईं। भाजपा बहुमत से चूक गई और उसे जेजेपी के साथ गठबंधन करना पड़ा। लेकिन 2024 में फिर से भाजपा ने दक्षिण हरियाणा की 17 में से 15 सीटें जीतकर, अहीरवाल की 11 में से 10 सीटें अपने नाम कर लीं। कांग्रेस के हाथ केवल 2 सीटें लगी। इसी के साथ भाजपा ने एक बार फिर पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली। इससे साफ है कि अहीरवाल बेल्ट भाजपा के लिए बहुमत हासिल करने का मजबूत आधार बना रहा है।
वहीं, बात करें राव नरेंद्र सिंह की राजनीतिक पृष्ठभूमि की तो, राव नरेंद्र सिंह के पिता स्वर्गीय राव बंसी सिंह भी तीन बार विधायक रहे हैं और हरियाणा सरकार में मंत्री पद संभाल चुके हैं। उनका सियासी सफर 1972 में शुरू हुआ जब वे राव इंद्रजीत के पिता राव बीरेंद्र सिंह की विशाल हरियाणा पार्टी के उम्मीदवार के रूप में विधायक बने। बाद में विशाल हरियाणा पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया… 1980 और 1991 में भी वे कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर चुनाव जीतते रहे। खास तौर पर 1991 में उन्होंने राव इंद्रजीत के भाई राव अजीत सिंह को हराकर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत कर ली।
आज राव इंद्रजीत सिंह को भाजपा के भीतर बल्कि अहीरवाल के दूसरे भाजपा नेताओं जैसे राव नरबीर और पूर्व मंत्री अभय सिंह यादव की चुनौती झेलनी पड़ रही है। ऐसे में अब कांग्रेस ने अहीरवाल के समीकरणों को ध्यान में रखते हुए प्रदेश अध्यक्ष के रूप में राव नरेंद्र की ताजपोशी की है, जिससे राव इंद्रजीत को कांग्रेस की ओर से भी बड़ी चुनौती मिलेगी।
राव इंद्रजीत और आरती राव ने साफ कहा है कि, अहीरवाल ने भाजपा सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने दावा किया कि, 2024 में जब लोग भाजपा की सत्ता वापसी पर संदेह जता रहे थे, तब उन्होंने ही माहौल बनाया और भाजपा को तीसरी बार सत्ता दिलाई। राव इंद्रजीत ने मुख्यमंत्री नायब सैनी के मंच से भी अपना श्रेय जताया था, जिसके जवाब में मुख्यमंत्री ने कहा कि, ये सरकार 36 बिरादरी समेत पूरे हरियाणा की है।
हरियाणा की राजनीति में अहीरवाल की अहम भूमिका किसी से छुपी नहीं है। और ये साबित 2024 के चुनावी नतीजों कर भी दिया था कि राज्य की सत्ता की चाबी अब भी इसी इलाके के पास है। कांग्रेस ने राव नरेंद्र को प्रदेश अध्यक्ष चुनकर इसी चाबी को दोबारा साधने की कोशिश की है, जबकि भाजपा के लिए राव इंद्रजीत का प्रभाव निर्णायक बना हुआ है।
आने वाले समय में ये देखना दिलचस्प होगा कि नया नेतृत्व क्या वाकई कांग्रेस की खोई ज़मीन वापस दिला पाएगा, या फिर भाजपा अहीरवाल बेल्ट के भरोसे अपने गढ़ को मजबूत बनाए रखेगी। राजनीति के इस रण में नेतृत्व और रणनीति की नई तस्वीरें उभरना तय हैं।
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