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Donald Trump: ‘कश्मीर मुद्दे का हल निकलने के लिए भारत-पाकिस्तान के साथ काम करूंगा’, सीजफायर के बीच बोले ट्रंप

भारत और पाकिस्तान के बीच शनिवार को संघर्ष विराम की घोषणा के चंद घंटों बाद ही सीमा पर गोलीबारी और ड्रोन हमलों ने एक बार फिर इस शांति प्रयास को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संघर्ष विराम का पहला दावा करते हुए इसे अमेरिका की मध्यस्थता का परिणाम बताया। उन्होंने सोशल मीडिया मंच ट्रूथ सोशल पर एक विस्तृत पोस्ट में न सिर्फ संघर्ष विराम का श्रेय लिया, बल्कि कश्मीर मुद्दे के समाधान में मदद की पेशकश भी कर दी। ट्रंप का यह बयान दोनों देशों में तीखी प्रतिक्रियाएं पैदा करने वाला रहा।

शनिवार शाम को भारत-पाकिस्तान सीमा पर चल रहे सैन्य तनाव के बीच शाम पांच बजे संघर्ष विराम की घोषणा की गई थी। इस घोषणा से पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो द्वारा पीएम नरेंद्र मोदी, पाक पीएम शहबाज शरीफ, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर और दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों से बातचीत करने की बात कही गई। इसके बाद अमेरिका की भूमिका पर अटकलें शुरू हुईं और कुछ ही समय बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीधे-सीधे कहा कि अमेरिका की मध्यस्थता से यह शांति संभव हुई है।

ट्रंप ने कहा कि उन्हें भारत और पाकिस्तान के नेतृत्व पर गर्व है क्योंकि उन्होंने यह समझा कि अब समय आ गया है जब संघर्ष को रोका जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस संघर्ष में लाखों निर्दोष लोग मारे जा सकते थे, और इसीलिए यह ऐतिहासिक निर्णय जरूरी था। ट्रंप ने आगे लिखा, “मुझे गर्व है कि अमेरिका ने आपको इस वीरतापूर्ण निर्णय तक पहुंचाने में मदद की। अब हम इन दोनों देशों के साथ व्यापार को भी बढ़ावा देंगे और देखेंगे कि क्या हजार साल पुराने कश्मीर मुद्दे का कोई हल निकाला जा सकता है।”

हालांकि भारत ने इस संघर्ष विराम में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका को सिरे से खारिज कर दिया। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने स्पष्ट किया कि यह एक द्विपक्षीय समझौता था और इसमें कोई तीसरी शक्ति शामिल नहीं थी। उनका यह बयान सीधे तौर पर डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता की दावेदारी को खारिज करता दिखा।

संघर्ष विराम की घोषणा के कुछ ही घंटों के भीतर पाकिस्तान ने एक बार फिर अपनी नापाक हरकतें शुरू कर दीं। जम्मू-कश्मीर के आरएसपुरा, सांबा, ललियाल और रामगढ़ में देर रात तक गोलाबारी और धमाकों की आवाजें सुनाई दीं। इसमें बीएसएफ के उपनिरीक्षक मोहम्मद इम्तियाज शहीद हो गए जबकि सात अन्य जवान घायल हो गए। इसके साथ ही पंजाब, राजस्थान और गुजरात के कई जिलों में धमाके हुए और सुरक्षा कारणों से 15 शहरों में ब्लैकआउट करना पड़ा।

भारत सरकार ने इन घटनाओं को संघर्ष विराम की गंभीर अवहेलना बताया और सेना को जवाबी कार्रवाई की खुली छूट दे दी। विदेश सचिव मिस्री ने रात 11 बजे प्रेस वार्ता में पाकिस्तान को इस संकट के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए सख्त प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को गंभीरता से स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए और तुरंत संघर्ष विराम के उल्लंघन को रोकने की दिशा में कदम उठाने चाहिए।

इसके बावजूद, डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका की भूमिका को रेखांकित करते हुए एक और ट्वीट किया जिसमें उन्होंने लिखा, “अमेरिका की मध्यस्थता में रातभर चली बातचीत के बाद यह जानकारी साझा करते हुए खुशी हो रही है कि भारत और पाकिस्तान पूरी तरह से सैन्य कार्रवाई रोकने को तैयार हो गए हैं। दोनों देशों को समझदारी से भरे इस निर्णय के लिए बधाई।” इस पोस्ट के बाद भारत में एक बार फिर बहस शुरू हो गई कि क्या अमेरिका इस संघर्ष विराम का इस्तेमाल अपने चुनावी हितों के लिए कर रहा है।

भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि आतंकवाद के खिलाफ उसकी नीति में कोई बदलाव नहीं आएगा। इसके साथ ही सिंधु जल संधि को भी निलंबित रखा जाएगा। यह पाकिस्तान के लिए एक बड़ा कूटनीतिक झटका था, क्योंकि इससे उसके जल संसाधनों पर असर पड़ सकता है। भारत की ओर से यह स्पष्ट संकेत था कि वह शांति की पहल को एकतरफा नहीं मानता और यदि पाकिस्तान नीतियों में बदलाव नहीं लाता तो संघर्ष विराम लंबे समय तक नहीं टिकेगा।

भारतीय सेना ने संघर्ष विराम के उल्लंघन के खिलाफ कड़ी निगरानी शुरू कर दी है। सेना प्रमुख और गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों की एक बैठक में रणनीति तय की गई और सेनाओं को सीमाओं पर तैनाती बढ़ाने के आदेश दिए गए। इसके अलावा, 12 मई को दोपहर 12 बजे दोनों देशों के डीजीएमओ के बीच एक और बातचीत की योजना बनाई गई है ताकि आगे की दिशा तय की जा सके।

ट्रंप की तरफ से कश्मीर मुद्दे को ‘हजार साल पुराना’ बताकर समाधान की पेशकश करना भी भारत के लिए असहज करने वाला था। भारत हमेशा से कश्मीर को अपना आंतरिक मामला मानता आया है और इस पर किसी भी बाहरी शक्ति की मध्यस्थता को खारिज करता रहा है। इससे पहले भी जब ट्रंप ने अपने कार्यकाल में कश्मीर पर मध्यस्थता की बात कही थी, तब भारत ने इसे सिरे से नकार दिया था।

विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप की यह रणनीति आगामी अमेरिकी चुनावों को ध्यान में रखकर रची गई है। भारत और पाकिस्तान में बसे प्रवासी वोटरों को लुभाने के लिए वे इस तरह के बयान दे रहे हैं ताकि उन्हें यह संदेश दिया जा सके कि अमेरिका वैश्विक मंच पर शांति और कूटनीति का नेतृत्व कर रहा है। हालांकि, उनके इस प्रयास को भारत ने गंभीरता से नहीं लिया और साफ कर दिया कि कोई भी हल सिर्फ द्विपक्षीय बातचीत से ही निकाला जा सकता है।

इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट हो गया कि भारत अब पहले की तरह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के खिलाफ जवाब देने में झिझक नहीं रखता। भारत सरकार ने सीधे तौर पर अमेरिका को तो नाम नहीं लिया, लेकिन यह संकेत जरूर दिया कि तीसरे पक्ष की दखलंदाजी स्वीकार नहीं की जाएगी। वहीं, पाकिस्तान का संघर्ष विराम के बावजूद आतंक और हमलों की नीति पर कायम रहना दिखाता है कि उसकी मंशा में अब भी बदलाव नहीं आया है।

अमेरिका की भूमिका पर सवाल उठने के बावजूद, इस घटनाक्रम ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर यह बहस छेड़ दी है कि कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों को सुलझाने के लिए क्या बाहरी ताकतें कोई भूमिका निभा सकती हैं या यह पूरी तरह से भारत-पाकिस्तान के बीच की बात है। इस बीच, कश्मीर घाटी में तनाव फिर से बढ़ गया है और स्थानीय प्रशासन को सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करने के निर्देश दिए गए हैं।

भारत के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप के इस बयान का एकमात्र उद्देश्य अमेरिका की वैश्विक छवि को मजबूत करना और चुनावी लाभ प्राप्त करना है। वहीं, पाकिस्तान के लिए यह संदेश है कि यदि वह संघर्ष विराम के नियमों का उल्लंघन करता रहा तो भारत उसकी हर हरकत का जवाब देने को तैयार है।

Vishal Singh

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