क्यों अखिलेश के ‘PDA’ पर टूट पड़ी केशव-राजभर-निषाद की तिकड़ी?

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 अभी करीब डेढ़ साल दूर हैं। चुनाव आयोग ने तारीखों का ऐलान नहीं किया है और राजनीतिक दलों ने उम्मीदवार भी तय नहीं किए हैं। लेकिन अगर आपको लगता है कि चुनावी लड़ाई अभी शुरू नहीं हुई है, तो शायद आप उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से नहीं जानते।

यह वह राज्य है जहां चुनाव सिर्फ मतदान वाले दिन नहीं लड़े जाते, बल्कि कई साल पहले उनकी बिसात बिछनी शुरू हो जाती है। और इस समय यूपी की राजनीति में जो कुछ दिखाई दे रहा है, वह 2027 की उसी बड़ी लड़ाई की तैयारी है।

एक तरफ समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष Akhilesh Yadav हैं, जो 2024 लोकसभा चुनाव में मिले अच्छे प्रदर्शन के बाद अपने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले को और मजबूत करने में जुटे हैं। दूसरी तरफ बीजेपी और उसके सहयोगी दल हैं, जो इस सामाजिक समीकरण को कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

यही वजह है कि इन दिनों उत्तर प्रदेश के तीन बड़े ओबीसी चेहरे सबसे ज्यादा सक्रिय नजर आ रहे हैं— Keshav Prasad Maurya, Om Prakash Rajbhar और Sanjay Nishad। इनके लगातार बयानों को सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी समझना भूल होगी। इसके पीछे एक बड़ी रणनीति काम कर रही है।

2024 के चुनाव ने बदल दिया समीकरण

2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश ने देश की राजनीति को चौंका दिया। जिस राज्य में 2014 और 2019 में बीजेपी का दबदबा दिखाई देता था, वहीं 2024 में समाजवादी पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस सफलता के पीछे PDA फॉर्मूला एक बड़ा कारण रहा। अखिलेश यादव ने यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे बढ़कर पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एक साथ जोड़ने की कोशिश की। इसका असर कई सीटों पर देखने को मिला।

बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चिंता यह रही कि कुछ गैर-यादव पिछड़ी जातियों में भी समर्थन का झुकाव दिखाई दिया। यहीं से 2027 की नई राजनीतिक लड़ाई शुरू हुई।

आखिर क्या है PDA?

PDA का मतलब है— पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक।

अखिलेश यादव का दावा है कि अगर इन वर्गों को एक साझा राजनीतिक मंच पर लाया जाए तो उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन संभव है। क्योंकि राज्य की आबादी का बड़ा हिस्सा इन्हीं वर्गों से आता है।

लेकिन बीजेपी और उसके सहयोगी दल इस दावे को चुनौती दे रहे हैं। उनका कहना है कि PDA सिर्फ एक राजनीतिक नारा है और इसका लाभ सीमित वर्गों तक ही पहुंचता है।

यहीं से शुरू होती है सामाजिक समीकरणों की असली जंग।

क्यों आक्रामक हैं ओम प्रकाश राजभर?

एक समय समाजवादी पार्टी के सहयोगी रहे ओम प्रकाश राजभर आज उसके सबसे बड़े आलोचकों में शामिल हैं।

2022 विधानसभा चुनाव में वे सपा के साथ थे, लेकिन बाद में एनडीए का हिस्सा बन गए। पूर्वांचल में राजभर समाज के बीच उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है।

पिछले कुछ महीनों में उन्होंने लगातार समाजवादी पार्टी पर निशाना साधा है। कभी सपा में टूट की बात करते हैं, कभी पार्टी के सांसदों के असंतोष की चर्चा करते हैं और कभी PDA की अवधारणा पर ही सवाल खड़े कर देते हैं।

राजभर की रणनीति साफ है— सपा के सामाजिक गठबंधन के भीतर संदेह पैदा करना।

संजय निषाद का मिशन क्या है?

निषाद, मछुआरा और अन्य अतिपिछड़ी जातियों के बीच प्रभाव रखने वाले संजय निषाद भी लगातार PDA पर सवाल उठा रहे हैं।

उनका कहना है कि PDA में कुछ चुनिंदा जातियों की बात होती है, जबकि निषाद, गोंड, मझवार, खरवार जैसी जातियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी और उसके सहयोगी दल समझते हैं कि 2027 में अतिपिछड़ी जातियां निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। इसलिए इन समुदायों को साधने की कोशिश तेज हो गई है।

केशव मौर्य क्यों बने बीजेपी का सबसे बड़ा हथियार?

उत्तर प्रदेश में बीजेपी के सबसे बड़े ओबीसी चेहरों में से एक हैं केशव प्रसाद मौर्य।

2017 की बीजेपी जीत में मौर्य, शाक्य, सैनी और कुशवाहा समुदायों के समर्थन को अहम माना गया था। यही वजह रही कि 2022 में चुनाव हारने के बावजूद बीजेपी ने उन्हें डिप्टी सीएम पद पर बनाए रखा।

अब वे PDA के खिलाफ सबसे मुखर नेता बनकर उभरे हैं।

केशव मौर्य ने PDA का नया मतलब बताते हुए इसे “परिवार डेवलपमेंट एजेंसी” कहा। उनका आरोप है कि समाजवादी पार्टी सामाजिक न्याय की नहीं बल्कि परिवारवाद की राजनीति करती है।

यह बीजेपी की पुरानी राजनीतिक लाइन भी रही है— परिवारवाद बनाम संगठनवाद।

BJP आखिर PDA से क्यों चिंतित है?

सबसे बड़ा सवाल यही है।

अगर PDA प्रभावी नहीं होता तो बीजेपी के इतने बड़े नेता लगातार उस पर हमला नहीं करते। 2024 के चुनाव परिणामों ने संकेत दिया कि सामाजिक समीकरण बदल रहे हैं।

बीजेपी समझती है कि यदि पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों का बड़ा हिस्सा एक मंच पर आ गया तो मुकाबला कठिन हो सकता है।

इसीलिए पार्टी की रणनीति इस गठबंधन के भीतर मौजूद कमजोरियों को उजागर करने और अलग-अलग जातीय समूहों को अलग राजनीतिक पहचान देने की है।

सिर्फ PDA नहीं, नए वोटरों पर भी नजर

अखिलेश यादव भी सिर्फ PDA तक सीमित नहीं रहना चाहते।

वे ब्राह्मण समाज, व्यापारी वर्ग और युवाओं तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। “विजन इंडिया” जैसे कार्यक्रमों के जरिए वे उन वर्गों से संवाद बढ़ा रहे हैं जिन्हें परंपरागत रूप से बीजेपी का समर्थक माना जाता है।

अगर समाजवादी पार्टी इन वर्गों में थोड़ी भी सेंध लगाने में सफल होती है तो चुनावी मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है।

2027 की लड़ाई असल में किसकी है?

ऊपरी तौर पर यह बीजेपी बनाम सपा की लड़ाई दिखती है। लेकिन असल में यह सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भरोसे की लड़ाई है।

एक तरफ अखिलेश यादव PDA को सामाजिक न्याय का नया मॉडल बता रहे हैं। दूसरी तरफ बीजेपी और उसके सहयोगी दल इसे चुनावी नारा करार दे रहे हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में शतरंज की बिसात बिछ चुकी है। सभी खिलाड़ी अपनी चाल चल रहे हैं। सवाल सिर्फ इतना है कि 2027 तक जनता किस नैरेटिव पर भरोसा करती है।

क्योंकि इस बार यूपी की सत्ता का रास्ता केवल विकास, कानून-व्यवस्था या वैचारिक मुद्दों से नहीं गुजरेगा। यह रास्ता सामाजिक समीकरणों, जातीय संतुलन और राजनीतिक भरोसे की उस जटिल भूलभुलैया से  होकर जाएगा, जहां हर वोट और हर समुदाय निर्णायक भूमिका निभाएगा।और शायद यही वजह है कि चुनाव अभी दूर होने के बावजूद उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई शुरू हो चुकी है।

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