सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पर्यावरणविदों में बढ़ी चिंता
दिल्ली-एनसीआर की जहरीली होती हवा के बीच एक अदृश्य प्रहरी चुपचाप खड़ा है—अरावली पर्वत शृंखला। दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में शामिल अरावली न सिर्फ थार मरुस्थल को आगे बढ़ने से रोकती है, बल्कि राजधानी क्षेत्र के लिए प्राकृतिक एयर फिल्टर और जल-संतुलन की रीढ़ भी है। लेकिन अंधाधुंध खनन और विकास के दबाव में अब ये प्राचीन ढाल खुद अस्तित्व के संकट से जूझ रही है।
20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश ने पर्यावरणविदों की चिंता और बढ़ा दी। अदालत ने अरावली की नई परिभाषा तय करते हुए केवल 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों को ही पहाड़ी माना। इस फैसले का सीधा असर ये होगा कि, राजस्थान के 15 जिलों में मौजूद 12,081 पहाड़ियों में से सिर्फ 1,048 ही संरक्षण के दायरे में रहेंगी। यानी 90 फीसदी से ज्यादा अरावली क्षेत्र खनन और निर्माण के लिए खुल सकता है।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि, अगर अरावली कमजोर हुई तो दिल्ली-एनसीआर की हवा और ज्यादा जहरीली हो जाएगी। राजस्थान से उड़ने वाली रेत और धूल बिना किसी रुकावट राजधानी तक पहुंचेगी। पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार, दिल्ली के AQI में धूल की हिस्सेदारी पहले ही 30 से 40 फीसदी तक है। सीईईडब्ल्यू की रिपोर्ट बताती है कि, सड़क की धूल अकेले पीएम10 प्रदूषण के 65 फीसदी तक की वजह बनती है।
गुरु तेग बहादुर अस्पताल से जुड़ी रेस्पिरेटरी मेडिसिन विशेषज्ञ प्रो. डॉ. अंकिता गुप्ता कहती हैं कि अरावली का कटाव सीधे फेफड़ों पर हमला है। इससे अस्थमा, हृदय रोग और क्रॉनिक श्वसन बीमारियों के मामले बढ़ेंगे। उनका कहना है कि, क्षतिग्रस्त अरावली क्षेत्र दिल्ली के पीएम10 प्रदूषण में 15–20 फीसदी योगदान देता है और तापमान 1.5 से 2 डिग्री तक बढ़ा देता है। वे अरावली ग्रीन प्रोजेक्ट की मांग कर रही हैं।
हालांकि विवाद के बीच 24 दिसंबर 2025 को केंद्र सरकार के बयान से कुछ उम्मीद जगी। सरकार ने अरावली क्षेत्र में सभी मौजूदा खनन पट्टे रद्द करने और नए पट्टे जारी करने पर रोक लगाने की बात कही है। साथ ही ये भी स्पष्ट किया गया कि, संरक्षित क्षेत्र का विस्तार किया जाएगा। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि, सरकार अरावली के दीर्घकालिक संरक्षण को लेकर प्रतिबद्ध है।
अब निगाहें 7 जनवरी पर टिकी हैं। पूर्व वन संरक्षक डॉ. आरपी बलवान ने सुप्रीम कोर्ट में आदेश पर पुनर्विचार के लिए इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन दाखिल की है। अरावली विरासत जन अभियान के तहत देशभर में हस्ताक्षर अभियान भी चल रहा है। हरियाणा में मेवात, गुरुग्राम, फरीदाबाद, पलवल, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ और भिवानी जैसे जिले सीधे तौर पर प्रभावित होंगे।
इतिहास गवाह है कि, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से पहले भी अरावली को बचाया गया है। 2002 में अदालत ने खनन पर पूरी तरह रोक लगाई थी। 2004 में डीम्ड फॉरेस्ट पर वन संरक्षण अधिनियम लागू किया गया। बावजूद इसके, सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी की 2018 की रिपोर्ट बताती है कि, राजस्थान में खनन के कारण 31 पहाड़ियां पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं।
खनन से सालाना करीब 5000 करोड़ रुपये की रॉयल्टी जरूर मिलती है, लेकिन इसकी कीमत पर्यावरण, स्वास्थ्य और भविष्य की पीढ़ियां चुका रही हैं। अरावली से सटे फरीदाबाद के पाली, मांगर, धौज, अनखीर, कोट और खोरी जमालपुर जैसे गांवों के लिए ये पर्वतमाला जीवनरेखा है। यहीं से पशुओं के लिए चारा, पानी और किसानों के लिए उपजाऊ मिट्टी मिलती है।
भूवैज्ञानिकों के अनुसार, 2.5 अरब साल पुरानी अरावली भारतीय शील्ड का हिस्सा है। यही नहीं, फरीदाबाद की अरावली में स्थित पांच हजार साल पुराना परसोन मंदिर ऋषि पराशर की तपोभूमि माना जाता है। मान्यता है कि, महर्षि वेदव्यास का जन्म भी यहीं हुआ।
सवाल साफ है—अगर अरावली नहीं रही, तो क्या दिल्ली-एनसीआर सांस ले पाएगा?
अब फैसला अदालत और सरकार को करना है कि, वो विकास के नाम पर इतिहास, पर्यावरण और भविष्य को दांव पर लगाएंगे या इस अदृश्य प्रहरी को बचाएंगे।
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