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RSS program suspended?: RSS के कार्यक्रम में शामिल हुए अधिकारी होंगे सस्पेंड?, मंत्री प्रियांग खरगे ने सीएम सिद्दारमैया को लिखा पत्र, सरकारी कर्मचारी को नियमों के तहत करना होगा काम

RSS program suspended?: RSS के कार्यक्रम में शामिल हुए अधिकारी होंगे सस्पेंड?

 

कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांग खरगे ने राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को पत्र लिखकर एक अहम मांग रखी है। उन्होंने अनुरोध किया है कि राज्य सरकार के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को किसी भी ऐसे संगठन का हिस्सा बनने या उनके कार्यक्रमों में भाग लेने से प्रतिबंधित किया जाए, जिनका राजनीतिक झुकाव हो। मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस तरह के मामलों में यदि कोई सरकारी अधिकारी लिप्त पाया जाता है, तो उसके खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जाए।

खरगे ने इस पत्र में कर्नाटक सिविल सर्विस रूल्स, 2021 का हवाला देते हुए यह कहा कि यह कोई व्यक्तिगत राय या नया निर्देश नहीं है, बल्कि पहले से मौजूद नियमों का पालन करवाना ही उनका उद्देश्य है। उनके अनुसार, ये नियम राज्य के सभी सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों पर पहले से लागू हैं और इनका उद्देश्य प्रशासनिक तंत्र की निष्पक्षता और कार्यक्षमता को बनाए रखना है।

मंत्री प्रियंक खरगे ने यह मुद्दा तब उठाया जब उनके विभाग के कुछ अधिकारियों के आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के शताब्दी समारोह में भाग लेने की खबर सामने आई। उन्होंने बताया कि संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है और जल्द ही उन्हें निलंबित भी किया जाएगा। खरगे ने इस पर गहरी नाराजगी जताई और कहा कि किसी भी सरकारी अधिकारी को ऐसा कार्य करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जो सरकारी नियमों के विपरीत हो।

उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि जब 2013 में जगदीश शेट्टर मुख्यमंत्री थे, तब भी उन्होंने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में केवल पाठ्यक्रम से संबंधित गतिविधियों की ही अनुमति देने की बात कही थी। इस उदाहरण को देते हुए उन्होंने कहा कि सरकारें चाहे किसी भी दल की हों, प्रशासनिक मशीनरी का तटस्थ और नियमबद्ध रहना जरूरी है।

मंत्री ने यह भी बताया कि उन्हें जानकारी मिली है कि कई पंचायत विकास अधिकारी (PDO), ग्राम लेखाकार और अन्य राज्य कर्मचारी नियमित रूप से आरएसएस के कार्यक्रमों में भाग ले रहे हैं। यही नहीं, कुछ मामलों में उन्होंने सरकार के खिलाफ सार्वजनिक रूप से बयान भी दिए हैं। खरगे ने कहा कि यह स्थिति अत्यंत गंभीर है और इससे सरकार की छवि और प्रशासनिक तंत्र की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।

उन्होंने दोहराया कि किसी भी सिविल सेवक को यह समझना चाहिए कि जब वह सरकार के लिए काम करता है, तो कुछ नियमों और मर्यादाओं का पालन करना उसकी ज़िम्मेदारी होती है। सरकार के कर्मचारी होने के नाते उनकी प्राथमिक निष्ठा संविधान और राज्य सरकार के निर्देशों के प्रति होनी चाहिए, न कि किसी सामाजिक या राजनीतिक संगठन के प्रति।

खरगे ने इस मुद्दे पर कठोर रुख अपनाते हुए कहा कि यह केवल एक विभाग की बात नहीं है, बल्कि राज्य के समूचे प्रशासनिक ढांचे की विश्वसनीयता का प्रश्न है। उन्होंने मुख्यमंत्री से यह भी आग्रह किया कि राज्य स्तर पर एक स्पष्ट और सख्त दिशा-निर्देश जारी किया जाए, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी सरकारी अधिकारी किसी राजनीतिक या वैचारिक संगठन से न जुड़ पाए।

उन्होंने यह स्पष्ट किया कि किसी भी संगठन की विचारधारा से किसी को व्यक्तिगत रूप से सहमत होने का अधिकार जरूर है, लेकिन जब वह व्यक्ति एक सरकारी कर्मचारी होता है, तो उसे अपने व्यक्तिगत विचारों को प्रशासनिक कार्यों से अलग रखना होता है। यह संतुलन बनाए रखना ही एक सच्चे सिविल सेवक की पहचान है।

मंत्री ने यह भी कहा कि नियम केवल कागज़ों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि उनका व्यावहारिक रूप से क्रियान्वयन भी जरूरी है। उन्होंने प्रशासन से यह अपेक्षा जताई कि जो अधिकारी नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं, उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए ताकि एक सख्त संदेश दिया जा सके।

इस पूरे मामले में यह साफ दिखाई देता है कि कर्नाटक सरकार अब इस विषय पर कोई ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है। मंत्री की यह पहल सरकार के भीतर एक बड़ा संदेश है कि राजनीति और प्रशासन के बीच एक स्पष्ट रेखा खींची जानी चाहिए और उसे सख्ती से बनाए रखना सरकार की प्राथमिकता है।

सरकारी अधिकारियों की भूमिका नीतिगत, निष्पक्ष और जवाबदेह होती है। यदि वे किसी राजनीतिक संगठन या विचारधारा विशेष के प्रभाव में काम करेंगे, तो इससे लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है। मंत्री प्रियंक खरगे द्वारा उठाया गया यह कदम इसी संदर्भ में एक बड़ी चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।

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