राजस्थान

Rhetoric in the year 2025: साल 2025 में बयानबाजी से ‘तपा’ राजस्थान !

Rhetoric in the year 2025: साल 2025 में बयानबाजी से ‘तपा’ राजस्थान !

साल 2025 राजस्थान की राजनीति के लिए घटनापूर्ण और बहस से भरा साल रहा। विधानसभा चुनाव बीत चुके थे, लेकिन सत्ता और विपक्ष के बीच जारी बयानबाज़ी ने पूरे साल सियासी पारा ऊंचा बनाए रखा। राज्य में भाजपा की भजनलाल शर्मा सरकार ने जहां विकास और कानून व्यवस्था के एजेंडे को मजबूती से आगे बढ़ाने का दावा किया, वहीं कांग्रेस और आरएलपी जैसे दलों ने सरकार पर लोकतंत्र के हनन, एजेंसियों के दुरुपयोग और युवाओं की अनदेखी के आरोप लगाए।

लोकतांत्रिक विमर्श का स्वर कभी सभाओं में तो कभी सोशल मीडिया पर गूंजता रहा। जयपुर, जो परंपरागत रूप से राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है, पूरे वर्ष नेताओं के बयानों से सियासी गर्माहट में लिपटा रहा।

बात करें कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की… तो ये पूरे साल भाजपा सरकार पर हमलावर रहे। जयपुर में आयोजित प्रेसवार्ता में उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि, “राज्य में लोकतंत्र नहीं, तानाशाही चल रही है।” डोटासरा ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार विपक्ष की आवाज़ दबाने, लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमज़ोर करने और जनता से जुड़े मुद्दों को पीछे धकेलने में लगी है।

उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं का खुला दुरुपयोग हो रहा है और विपक्षी नेताओं को डराने की कोशिश की जा रही है। डोटासरा ने ऐलान किया कि यदि हालात नहीं सुधरे, तो कांग्रेस सड़कों पर उतरकर आंदोलन करेगी।

उनके इस बयान का भाजपा ने तीखा जवाब दिया और कहा कि कांग्रेस अपनी हार पचाने में असमर्थ है। राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि डोटासरा का यह रुख कांग्रेस को विपक्ष में मुखर बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा था।

वहीं, भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता राजेंद्र राठौड़ ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कहा कि “कांग्रेस का भविष्य खत्म हो चुका है, जनता ने उसे नकार दिया है।” उन्होंने मीडिया से बातचीत के दौरान कांग्रेस पर “नीति शून्यता” और “जनविश्वास की कमी” का आरोप लगाया।

जबकि राज्य के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने अपना शासनकाल मजबूत प्रशासन और कानून व्यवस्था पर केंद्रित रखा… उन्होंने पद संभालते ही स्पष्ट किया कि, राज्य में “कानून व्यवस्था सर्वोपरि” है और अपराधियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। भजनलाल शर्मा ने महिलाओं की सुरक्षा, साइबर अपराध, नशीले पदार्थों की तस्करी और अवैध खनन पर सख्त कार्रवाई की बात कही।

उन्होंने कहा कि “महिलाओं की सुरक्षा के लिए ‘कालिका यूनिट’ को और अधिक सशक्त किया जा रहा है।” साथ ही राज्य पुलिस को निर्देश दिया गया कि हर थाने को जवाबदेह बनाया जाए और अपराध दरों में गिरावट सुनिश्चित की जाए।

वहीं, पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि “मतदाता सूची के पुनरीक्षण में जल्दबाजी और दबाव दिखाता है कि कुछ न कुछ गड़बड़ है।” पायलट ने आरोप लगाया कि फील्ड स्टाफ पर अवांछित दबाव है, जिससे गलत सूचनाएं और त्रुटियां बढ़ रही हैं। उन्होंने बताया कि कई जगह पर अधिकारियों ने तनाव में आत्मघाती कदम तक उठाए हैं, जो संस्थागत असंतुलन का संकेत है।

जबकि, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र की भाजपा सरकार पर केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि “ईडी और सीबीआई अब राजनीतिक हथियार बन चुकी हैं, जिनका इस्तेमाल विपक्षी नेताओं को डराने के लिए किया जा रहा है।” गहलोत के अनुसार, भाजपा शासित राज्यों में भ्रष्टाचार के मामलों पर आंखें मूंद ली जाती हैं, जबकि विपक्ष शासित राज्यों में कार्रवाई का दिखावा किया जाता है। उन्होंने कहा कि इससे लोकतंत्र की विश्वसनीयता कम हो रही है।

वहीं, राज्य की उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी ने ऐतिहासिक हल्दीघाटी युद्ध को लेकर दिए गए एक बयान से नया विवाद खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि पहले के शिलालेख में महाराणा प्रताप को युद्ध में पराजित बताया गया था, जिसे उनके प्रयासों से 2021 में बदला गया।

दीया कुमारी ने इसे अपने सांसद कार्यकाल की बड़ी उपलब्धि बताया और कहा कि “ASI के अधीन आने वाले शिलालेख को बदलवाने के लिए दिल्ली तक आवाज उठानी पड़ी थी।” उनके इस बयान के बाद इतिहासकारों और विपक्ष ने सियासी तंज कसा। कुछ ने इसे इतिहास के राजनीतिक उपयोग की मिसाल बताया, जबकि समर्थक इसे “स्वाभिमान की बहाली” कहने लगे।

वहीं, आरएलपी प्रमुख और नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा SI भर्ती-2021 रद्द किए जाने के फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि “ये जयपुर के शहीद स्मारक पर 127 दिन तक चले धरने की जीत है।”… बेनीवाल ने आरोप लगाया कि, पिछली सरकार ने पेपर लीक में दोषियों को बचाया और मौजूदा सरकार ने भी ढिलाई दिखायी।

उन्होंने कहा कि युवाओं के हित में ये फैसला बड़े बदलाव की शुरुआत है। बेनीवाल ने एलान किया कि वे छात्रों और बेरोजगार युवाओं की लड़ाई सड़क से लेकर सदन तक जारी रखेंगे। इस बयान ने उन्हें युवाओं के सबसे मुखर चेहरे के रूप में उभारा।

जबकि, शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने बासनपीर गांव में ऐतिहासिक छतरियों के पुनर्निर्माण विवाद को लेकर कांग्रेस नेताओं पर निशाना साधा। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि “सच्चाई सामने आनी चाहिए कि इनकी दुकान नफरत की है या कुछ और।” भाटी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस अल्पसंख्यक समुदाय को सिर्फ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती है। उन्होंने समुदाय के लोगों से अपील की कि वे अपने असली हितैषियों को पहचानें। इस बयान के बाद हिंदू और मुस्लिम राजनीति की पुरानी बहस फिर से चर्चा में आ गई।

वहीं, शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय करने के लिए कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि “अगर छात्रों को 80 में से 40 अंक नहीं मिलते, तो शिक्षक को जिम्मेदार माना जाएगा।” उन्होंने री-टोटलिंग, री-चेकिंग और प्रश्नपत्र खंडवार मूल्यांकन प्रणाली की घोषणा की। शिक्षा मंत्री ने कहा कि शिक्षा सुधार सिर्फ नीतियों से नहीं, बल्कि जवाबदेही से आएगा। शिक्षकों के संगठनों ने इसे ‘कठोर कदम’ बताया, जबकि कई शिक्षा विशेषज्ञों ने इसे “जवाबदेही की शुरुआत” कहा।

वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने सार्वजनिक संबोधन में स्वास्थ्य और फिटनेस पर बात की। उन्होंने कहा कि “मोटापा अब वैश्विक महामारी बन चुका है, इससे निपटना केवल सरकार का नहीं बल्कि समाज का दायित्व है।” उन्होंने मज़ाकिया अंदाज़ में जोड़ा, “कुछ लोग बाहर से पतले दिखते हैं लेकिन अंदरूनी चर्बी सबसे खतरनाक होती है।” हालांकि उनका ये बयान राजनीतिक संदर्भों में भी देखा गया। कुछ नेताओं ने कहा कि ये टिप्पणी राजनीतिक ‘भारीपन’ पर व्यंग्य है, जबकि समर्थकों ने इसे ‘हेल्थ अवेयरनेस’ की पहल बताया।

2025 के राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो स्पष्ट होता है कि राजस्थान में सत्ता और विपक्ष दोनों ही अपने-अपने तरीके से जनता से संवाद साधने की कोशिश में लगे रहे। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने जहां प्रशासनिक सख्ती और विकास कार्यों पर ध्यान दिया, वहीं कांग्रेस ने लोकतंत्र और संस्थागत पारदर्शिता के मुद्दों को उठाकर अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी।

दीया कुमारी और वसुंधरा राजे जैसे नेता भाजपा में अगली पंक्ति का नेतृत्व मजबूत करते नजर आए, जबकि कांग्रेस की ओर से सचिन पायलट और अशोक गहलोत के अलग-अलग बयान पार्टी के अंदरूनी समीकरणों की झलक भी दिखाते रहे। साल 2025 में राजस्थान की राजनीति जिस तरह बयानों, आरोपों और प्रतिआरोपों के इर्द-गिर्द घूमती रही, उसने ये साबित किया कि लोकतंत्र में विचारों की बहस जिंदा है।

सत्ता पक्ष ने शासन की प्राथमिकताओं को सामने रखा, तो विपक्ष ने सवाल उठाकर निगरानी की भूमिका निभाई। जनता, जो हर बार इस सियासी संघर्ष की निर्णायक शक्ति होती है, वो अब पहले से अधिक सजग, प्रश्नाकुल और जवाब मांगने वाली दिखाई दी। राजनीति में यही जागरूकता किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति होती है।

Kirti Bhardwaj

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