Protests by student organizations: JNU में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद प्रदर्शन
नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) एक बार फिर राजनीतिक विवाद के केंद्र में आ गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश से जुड़े मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार किए जाने के बाद जेएनयू परिसर में विरोध-प्रदर्शन देखने को मिला। इस प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ लगाए गए आपत्तिजनक और उकसाऊ नारों का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसने पूरे मामले को और अधिक तूल दे दिया है।
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए के तहत दर्ज मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत के इस फैसले के बाद लेफ्ट समर्थित छात्र संगठनों और जेएनयू स्टूडेंट्स यूनियन से जुड़े छात्रों ने विश्वविद्यालय परिसर में प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन साबरमती ढाबे और आसपास के इलाकों में हुआ, जहां बड़ी संख्या में छात्र एकत्रित हुए।
वायरल हो रहे वीडियो में देखा जा सकता है कि प्रदर्शन के दौरान कुछ छात्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक और भड़काऊ नारे लगा रहे हैं। वीडियो में ‘मोदी-शाह तेरी कब्र खुदेगी, जेएनयू की धरती पर’ जैसे नारे सुनाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर यह वीडियो सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है। कई लोगों ने इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर असहनीय बताया, वहीं कुछ वर्गों ने इसे छात्रों का विरोध दर्ज कराने का तरीका कहा।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम पर अब तक जेएनयू प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। न ही यह स्पष्ट किया गया है कि वायरल वीडियो की सत्यता की जांच की जा रही है या नहीं। वहीं, दिल्ली पुलिस की ओर से भी अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।
इस प्रदर्शन के दौरान जेएनयू स्टूडेंट्स यूनियन ने 5 जनवरी 2020 को हुए जेएनयू हिंसा मामले को भी याद किया। यूनियन का कहना है कि उस दिन नकाबपोश लोगों ने परिसर में घुसकर छात्रों और शिक्षकों पर हमला किया था, लेकिन छह साल बीत जाने के बावजूद किसी भी दोषी को सजा नहीं मिली। छात्रों का आरोप है कि इस हिंसा के पीछे आरएसएस और एबीवीपी की भूमिका रही, लेकिन अब तक न्याय नहीं मिला।
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) ने भी इस मुद्दे पर बयान जारी किया। संगठन ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा गुलफिशा फातिमा, मौरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत देने के फैसले का स्वागत किया, लेकिन साथ ही उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न मिलने को विडंबनापूर्ण बताया। AISA का कहना है कि यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
वहीं, जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन ने भी इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया दी है। एसोसिएशन ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न मिलने पर अफसोस जताते हुए इसे जेएनयू प्रशासन और दिल्ली पुलिस की विफलता करार दिया। शिक्षकों का कहना है कि लंबे समय से चले आ रहे मामलों में देरी और निष्पक्ष जांच का अभाव विश्वविद्यालय की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी, छात्र राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों को लेकर बहस लगातार तेज हो रही है। एक ओर जहां सरकार समर्थक वर्ग इस तरह के नारों को देशविरोधी मानसिकता का प्रतीक बता रहा है, वहीं विपक्षी और छात्र संगठन इसे लोकतांत्रिक विरोध का हिस्सा मान रहे हैं।
फिलहाल, वायरल वीडियो ने एक बार फिर जेएनयू को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन, पुलिस और राजनीतिक दल इस मामले पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या इस विवाद के बाद किसी तरह की कार्रवाई की जाती है या नहीं।
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