JNU Student Controversy : JNU में हो रही नफरत की पढ़ाई!
दिल्ली के नामचीन विश्वविद्यालय जेएनयू से एक बार फिर नारेबाज़ी का वीडियो सामने आया है, जिसमें कुछ लेफ्ट विचारधारा से जुड़े छात्र “शरजील और उमर को ज़मानत नहीं मिली तो क़ब्र खोद दो…” जैसे नारे लगा रहे हैं। ये विडंबना है कि, जहां किताबों, तर्क और विचारों से बदलाव की बात की जानी चाहिए, वहां अब मौत और कब्र जैसे शब्दों में गुस्सा व्यक्त किया जा रहा है। सवाल उठता है कि, क्या असहमति की राजनीति अब इतना असहिष्णु रूप ले चुकी है?
लोकतंत्र में असहमति और विरोध लोकतांत्रिक ताक़त हैं। अदालत के फैसले पर बहस की जा सकती है, निष्पक्षता पर सवाल भी उठाए जा सकते हैं, लेकिन अदालत के फैसले को हिंसक प्रतीकों से चुनौती देना लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है। न्यायपालिका संविधान का अभिन्न हिस्सा है। उसके निर्णय से असहमति रखने वाले लोग अपील कर सकते हैं, समीक्षा याचिका दे सकते हैं, लेकिन “कब्र खोद दो” जैसे नारे देना किसी भी सभ्य विमर्श का हिस्सा नहीं हो सकता।
लेफ्ट छात्र संगठनों का इतिहास वैचारिक बहस और बौद्धिकता से भरा रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ये बहस भावनात्मक कट्टरता में बदलती जा रही है। शरजील इमाम और उमर खालिद जैसे लोग जिन पर देशविरोधी और भड़काऊ भाषणों के आरोप हैं, वे लेफ्ट राजनीति की “शहीद” छवि बना दिए गए हैं। अदालत का काम साक्ष्यों पर निर्भर है, भावनाओं पर नहीं। ऐसे में छात्रों को न्यायपालिका पर भरोसा रखना चाहिए, न कि कब्र और मौत की भाषा में प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
जेएनयू जैसे संस्थान का मकसद विचारों का टकराव नहीं, विचारों का संवाद होना चाहिए। लेकिन आज ये संवाद नफरत में बदल रहा है। “अगर हमारी बात नहीं मानी गई तो सबकी कब्र खोद दो” जैसी सोच, लोकतंत्र की रीढ़, अभिव्यक्ति की आज़ादी को ही कमजोर कर देती है। आज का छात्र जो समाज में परिवर्तन की उम्मीद लेकर निकलता है, अगर वही हिंसा के प्रतीक अपनाने लगे तो आने वाली पीढ़ी क्या सीखेगी?
हाल ही में विश्वविद्यालय में facial recognition system लागू किया गया है ताकि सुरक्षा बढ़ाई जा सके और कैंपस में बाहरी लोगों की एंट्री नियंत्रित हो सके… लेकिन लेफ्ट संगठनों ने इसके खिलाफ भी विरोध शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि, इससे “निगरानी बढ़ेगी” और “विचार स्वतंत्रता पर हमला होगा।” ये तर्क तब कमजोर पड़ जाता है, जब वही लोग सोशल मीडिया, स्मार्टफोन और बायोमेट्रिक सिस्टम का उपयोग बिना किसी आपत्ति के करते हैं। सुविधा और विचारधारा के बीच ये दोहरापन साफ दिखाई देता है।
असल समस्या इनमें से किसी फैसले या नियम की नहीं, बल्कि मानसिकता की है। जब विरोध अब समाधान खोजने का साधन न रहकर, नफरत और प्रतिरोध का स्थायी रूप बन जाता है, तो ये विचार नहीं, बीमारी बन जाता है। यही वो मानसिक विकार है जिसे आज के युवा वर्ग को पहचानने और रोकने की ज़रूरत है। असली क्रांति किताब से आती है, कब्र से नहीं।
दुनिया के बड़े विश्वविद्यालय अपने छात्रों को संवाद और नवाचार के लिए तैयार करते हैं… हमारे विश्वविद्यालय उन्हें “कब्र खोदने” की संस्कृति में नहीं धकेल सकते। पढ़ाई और बहस को राजनीतिक चरमपंथ का औज़ार बनाना न तो संस्थान के लिए अच्छा है, न छात्रों के लिए।
इस समय जेएनयू और अन्य विश्वविद्यालयों को आत्ममंथन की ज़रूरत है। ये समीक्षा जरूरी है कि, आखिर क्यों विचारधारा पढ़ाई और तर्क से ज्यादा ज़हरीली उग्रता की ओर बढ़ रही है। लोकतंत्र में किसी भी सत्ता या व्यक्ति से असहमति स्वाभाविक है, लेकिन असहमति को हिंसात्मक प्रतीकों में ढालना समाज को विभाजित कर देता है।
कब्र की राजनीति हमें कहीं नहीं ले जाएगी… ये हमें सिर्फ गड्ढे में गिराएगी, जिससे बाहर निकलना और मुश्किल होगा… जरुरत इस बात की है कि विश्वविद्यालय के छात्र, शिक्षक और प्रबंधन सभी मिलकर फिर से उस विचारपरक संस्कृति को पुनर्जीवित करें, जिसने कभी जेएनयू को भारत की सबसे बौद्धिक भूमि बनाया था। विरोध तो करें, लेकिन तर्क से, सवाल तो उठाएं, लेकिन संविधान की मर्यादा में। नफरत से नहीं, संवाद से ही असली क्रांति होती है।
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