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Priyanka Gandhi asks Nitin Gadkari for time: संसद सत्र में प्रियंका गांधी ने नितिन गडकरी से मांगा समय, परिवहन मंत्री ने तुरंत दिया प्रियंका गांधी को मिलने का समय, जून से मांग रही थी प्रियंका गांधी मंत्रालय से मिलने का समय

Priyanka Gandhi asks Nitin Gadkari for time: संसद सत्र में प्रियंका गांधी ने नितिन गडकरी से मांगा समय

संसद का शीतकालीन सत्र इस बार लगातार हंगामे और तीखी बहसों के बीच चल रहा है। विभिन्न मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव देखने को मिल रहा है। इसी सत्र के दौरान मनरेगा से जुड़े बदलावों और उसकी जगह लाए गए नए बिल को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार रोजगार से जुड़े इस अहम कानून को कमजोर कर रही है, जबकि सरकार इसे सुधार की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है।

गुरुवार को लोकसभा के प्रश्नकाल के दौरान कांग्रेस नेता और केरल के वायनाड से सांसद प्रियंका गांधी ने प्रदूषण और मनरेगा से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार को घेरा। अपनी बात रखते हुए उन्होंने न सिर्फ नीति स्तर के सवाल उठाए, बल्कि एक व्यावहारिक समस्या का भी ज़िक्र किया। प्रियंका गांधी ने सदन में केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी से सीधे संवाद करते हुए अपने संसदीय क्षेत्र से जुड़े कार्यों को लेकर मुलाकात का समय मांगा।

प्रियंका गांधी ने कहा कि वह जून महीने से लगातार मंत्रालय से मिलने का समय मांग रही हैं, लेकिन अब तक उन्हें अप्वाइंटमेंट नहीं मिल पाया है। उन्होंने सदन में कहा कि उनके संसदीय क्षेत्र से जुड़े कई महत्वपूर्ण काम लंबित हैं, जिन पर चर्चा के लिए केंद्रीय मंत्री से मुलाकात जरूरी है। उन्होंने आग्रह किया कि उन्हें समय दिया जाए ताकि क्षेत्र की समस्याओं पर विस्तार से बात की जा सके।

प्रियंका गांधी की इस अपील पर सदन में मौजूद केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उनके यहां किसी तरह के औपचारिक अप्वाइंटमेंट की जरूरत नहीं होती। गडकरी ने सदन में ही कहा कि उनके कार्यालय के दरवाजे सभी सांसदों के लिए हमेशा खुले रहते हैं। उन्होंने प्रियंका गांधी को प्रश्नकाल समाप्त होते ही अपने संसद कार्यालय में आने का आमंत्रण दिया और भरोसा दिलाया कि वह उनकी बात ध्यान से सुनेंगे।

नितिन गडकरी का यह जवाब सदन में चर्चा का विषय बन गया। विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों ही ओर से इस प्रतिक्रिया को असामान्य लेकिन सकारात्मक माना गया। आमतौर पर संसद में सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी बयानबाज़ी देखने को मिलती है, लेकिन इस मौके पर संवाद का एक अलग ही स्वर नजर आया। ऐसा माना जा रहा है कि प्रियंका गांधी को भी इस तरह के त्वरित और खुले जवाब की उम्मीद नहीं थी।

प्रश्नकाल समाप्त होते ही प्रियंका गांधी नितिन गडकरी के संसद स्थित कार्यालय पहुंचीं। वहां दोनों नेताओं के बीच मुलाकात हुई और वायनाड समेत अन्य मुद्दों पर बातचीत की गई। सूत्रों के मुताबिक, इस मुलाकात में सड़क परियोजनाओं, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे से जुड़े विषयों पर चर्चा हुई। बातचीत का माहौल औपचारिक होने के बजाय सहज और सौहार्दपूर्ण बताया जा रहा है।

इस मुलाकात के दौरान एक दिलचस्प पहलू भी सामने आया। नितिन गडकरी ने प्रियंका गांधी को चावल से बनी एक डिश परोसी। इसे लेकर भी संसद परिसर में चर्चा रही। राजनीतिक मतभेदों के बीच इस तरह की मुलाकात और आतिथ्य को कई लोग संसदीय परंपराओं और संवाद की संस्कृति के रूप में देख रहे हैं।

इससे पहले लोकसभा में प्रियंका गांधी ने चंडीगढ़-शिमला रूट से जुड़े सवाल भी उठाए थे। उन्होंने सड़क सुरक्षा, यातायात दबाव और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर सरकार से जवाब मांगा। उनके सवालों का जवाब देते हुए नितिन गडकरी ने मंत्रालय की ओर से चल रही योजनाओं और सुधारों की जानकारी दी। इसी संवाद के दौरान प्रियंका गांधी ने अपने क्षेत्र के मुद्दों को लेकर मिलने की बात उठाई थी।

शीतकालीन सत्र के दौरान यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब संसद में लगातार गतिरोध बना हुआ है। मनरेगा में बदलाव, प्रदूषण, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर विपक्ष सरकार को घेर रहा है। वहीं सरकार अपने फैसलों को विकास और सुधार के तौर पर पेश कर रही है। इस माहौल में प्रियंका गांधी और नितिन गडकरी के बीच हुआ यह संवाद एक अलग उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि संसद के भीतर इस तरह का सीधा संवाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए अहम है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद और समन्वय से ही संसदीय व्यवस्था मजबूत होती है। प्रियंका गांधी द्वारा सदन में सीधे मुलाकात का मुद्दा उठाना और नितिन गडकरी का तत्काल सकारात्मक जवाब देना इसी प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है।

शीतकालीन सत्र के आगे भी हंगामेदार रहने के संकेत हैं। कई अहम विधेयकों पर चर्चा होनी है और विपक्ष सरकार के फैसलों पर सवाल उठाने की तैयारी में है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सदन के भीतर इस तरह के संवाद और सौहार्द के और भी मौके देखने को मिलते हैं या राजनीतिक टकराव ही सत्र की पहचान बना रहता है।

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