power structure of bangladesh: बांग्लादेश की सत्ता संरचना नहीं दे रही भारत का साथ
बांग्लादेश की राजधानी ढाका में 17 दिसंबर को भारतीय उच्चायोग के सामने हुई हिंसक घटना को एक आकस्मिक या स्वतःस्फूर्त प्रदर्शन के रूप में नहीं देखा जा रहा है। सुरक्षा और कूटनीतिक हलकों का मानना है कि यह एक सुनियोजित राजनीतिक प्रयोग है, जिसका उद्देश्य बांग्लादेश में भारत के प्रभाव को सीमित करना और धीरे-धीरे उसे रणनीतिक रूप से हाशिये पर धकेलना है। भारत भले ही फिलहाल वेट एंड वॉच की नीति पर कायम हो, लेकिन जमीनी हालात यह संकेत दे रहे हैं कि बांग्लादेश की मौजूदा सत्ता संरचना अब भारत को एक स्वाभाविक मित्र देश के रूप में देखने के लिए तैयार नहीं है।
बांग्लादेश के गठन के समय से ही वहां भारत-विरोधी तत्व मौजूद रहे हैं। इन समूहों का वैचारिक और रणनीतिक झुकाव पाकिस्तान की ओर अधिक रहा है। हालांकि शेख हसीना के लंबे शासनकाल के दौरान इन ताकतों को प्रशासनिक सख्ती और राजनीतिक नियंत्रण के माध्यम से सीमित रखा गया। इस दौर में भारत और बांग्लादेश के रिश्ते रणनीतिक साझेदारी में बदले, सीमा सुरक्षा सहयोग मजबूत हुआ और आतंकवाद के खिलाफ साझा कार्रवाई ने दोनों देशों के बीच भरोसे को गहराया।
हालात अगस्त 2024 के बाद तेजी से बदले, जब शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा। उनके हटते ही बांग्लादेश में भारत-विरोधी माहौल खुलकर सामने आने लगा। भारतीय उच्चायोग के सामने हिंसक भीड़ का जुटना और सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश उसी बदलते राजनीतिक माहौल की एक कड़ी के रूप में देखी जा रही है। आशंका जताई जा रही है कि आने वाले समय में भारतीय राजनयिक प्रतिष्ठानों को सीधे निशाना बनाए जाने की घटनाएं बढ़ सकती हैं। मौजूदा यूनुस प्रशासन पर यह आरोप भी लग रहे हैं कि वह इस तरह की भीड़ को अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षण दे रहा है।
पाकिस्तान और चीन लंबे समय से बांग्लादेश में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करते रहे हैं। शेख हसीना सरकार और भारत के साथ घनिष्ठ संबंधों के चलते इन प्रयासों को सीमित सफलता ही मिल पाई थी। लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद समीकरण बदलते नजर आए। इसी बीच बांग्लादेश में अमेरिकी दिलचस्पी खुलकर सामने आई, जिसने पूरे घटनाक्रम को नई दिशा दी।
जुलाई-अगस्त 2024 में छात्र आंदोलनों के नाम पर जो घटनाएं शुरू हुईं, उन्होंने अंततः सत्ता परिवर्तन का रास्ता खोल दिया। विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिकी डीप स्टेट से जुड़े तत्वों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अमेरिकी विदेश नीति तंत्र से जुड़े कुछ प्रभावशाली समूहों ने शेख हसीना सरकार पर लगातार दबाव बनाया और सत्ता परिवर्तन के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार कीं।
शेख हसीना के हटने के बाद अमेरिका के हितों के अनुरूप एक स्वीकार्य नेतृत्व के तौर पर मोहम्मद यूनुस को सत्ता के केंद्र में लाया गया। यूनुस की निकटता क्लिंटन फाउंडेशन और जॉर्ज सोरोस जैसे वैश्विक प्रभावशाली नेटवर्क से पहले से रही है। सत्ता संभालने के बाद उनके नेतृत्व में बांग्लादेश ने भारत से रणनीतिक दूरी बनानी शुरू कर दी। मौजूदा हिंसक घटनाओं को इसी नीति के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है, जहां भीड़ को एक राजनीतिक औजार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।
बांग्लादेशी छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या की कोशिश के मामले में भारत पर आरोप मढ़ने की कोशिश भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। इसका उद्देश्य जनभावनाओं को भड़काना और भारत-विरोधी हिंसा को वैध ठहराना बताया जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस तरह की घटनाओं की आशंका पहले से जताई जा रही थी।
फिलहाल बांग्लादेश गंभीर राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। सुरक्षा तंत्र कमजोर नजर आ रहा है और इस्लामी कट्टरपंथी समूह दोबारा सक्रिय होते दिख रहे हैं। इन समूहों को एक ओर अमेरिकी रणनीतिक अनदेखी से और दूसरी ओर पाकिस्तान की मौके का फायदा उठाने वाली नीति से बल मिल रहा है। भारत-विरोधी नैरेटिव अब परोक्ष नहीं रहा, बल्कि खुलकर सामने आ चुका है।
बांग्लादेश अब चीन और अमेरिका की भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का खुला मैदान बनता जा रहा है, जहां भारत के हितों को व्यवस्थित रूप से चुनौती दी जा रही है। भारत के लिए यह सिर्फ पड़ोसी देश की आंतरिक राजनीति का मामला नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा सवाल है। भारत और बांग्लादेश के बीच 4,096 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है, जो सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है।
बांग्लादेश भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए जीवनरेखा की तरह है। अतीत में यह क्षेत्र ISI और कट्टरपंथी नेटवर्क का पारंपरिक मार्ग रहा है। अवैध घुसपैठ, जनसांख्यिकीय दबाव और सिलिगुड़ी कॉरिडोर यानी चिकन नेक पर अप्रत्यक्ष खतरा भारत के लिए वास्तविक चिंता का विषय बना हुआ है। यदि बांग्लादेश लंबे समय तक अस्थिर या रणनीतिक रूप से शत्रुतापूर्ण बना रहता है, तो इसका सीधा असर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा और स्थिरता पर पड़ सकता है।
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