मलिहाबाद में मंदिर-मस्जिद विवाद से बढ़ा सियासी तनाव, किसे चुनेंगी सपा?

उत्तर प्रदेश के लखनऊ के पास स्थित मलिहाबाद का कसमंडी कलां गांव इन दिनों आम के बागों से ज्यादा एक पुराने विवाद को लेकर सुर्खियों में है। यहां एक पुरानी इमारत को लेकर शुरू हुआ विवाद अब धार्मिक और राजनीतिक रंग ले चुका है। मामला सिर्फ एक ढांचे का नहीं रह गया, बल्कि अब यह दलित बनाम मुस्लिम और बीजेपी बनाम समाजवादी पार्टी की राजनीति तक पहुंच गया है।
गांव में स्थित इस इमारत को लेकर दो समुदाय आमने-सामने हैं। पासी समाज का दावा है कि यह 11वीं सदी में राजा कंस पासी द्वारा बनवाया गया किला और शिव मंदिर है। वहीं मुस्लिम समुदाय का कहना है कि यह एक प्राचीन मस्जिद और मजार है, जहां वर्षों से धार्मिक परंपराएं निभाई जाती रही हैं। दोनों पक्ष अपने-अपने दावों के समर्थन में ऐतिहासिक और स्थानीय दस्तावेजों का हवाला दे रहे हैं।
विवाद इतना बढ़ गया कि प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा और पूरे परिसर को सील कर दिया गया। फिलहाल वहां किसी भी तरह की धार्मिक गतिविधि पर रोक लगा दी गई है। हालात को नियंत्रित करने के लिए इलाके में पीएसी की एक कंपनी भी तैनात की गई है।
इस विवाद की खास बात यह है कि इसका असर केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रदेश की राजनीति पर भी असर डाल रहा है। माना जा रहा है कि यह मामला समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती बन गया है, खासकर उसके पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण के लिहाज से, जिसने 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को मजबूत बढ़त दिलाई थी।
मुस्लिम समुदाय पारंपरिक रूप से समाजवादी पार्टी का मजबूत वोट बैंक रहा है, वहीं पासी समुदाय भी पिछले चुनाव में सपा के समर्थन में खड़ा नजर आया था। अब दोनों समुदायों के आमने-सामने आने से सपा के लिए संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो गया है। विवाद तब और बढ़ गया जब कुछ स्थानों पर नमाज के जवाब में हनुमान चालीसा का पाठ किया गया। इससे तनाव और गहरा गया और प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रण में लेने के लिए सख्त कदम उठाए।
वहीं पासी समाज से जुड़े संगठन लखन आर्मी का कहना है कि यह स्थल राजा कंस पासी की ऐतिहासिक विरासत है और इसकी जांच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से कराई जानी चाहिए। उनका यह भी कहना है कि कार्बन डेटिंग जैसी वैज्ञानिक जांच से इसकी वास्तविक उम्र का पता लगाया जाए।
दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष का दावा है कि यह जमीन वक्फ रिकॉर्ड में कब्रिस्तान के रूप में दर्ज है और यहां वर्षों से धार्मिक गतिविधियां होती रही हैं। राजनीतिक हलकों में भी इस विवाद को लेकर हलचल तेज है। बीजेपी इस मामले में सीधे तौर पर अपनी भूमिका से इनकार कर रही है, लेकिन कुछ नेताओं का कहना है कि यह सिर्फ ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण का मुद्दा है। वहीं समाजवादी पार्टी इस विवाद पर बेहद सावधानी से प्रतिक्रिया दे रही है ताकि किसी भी पक्ष की नाराजगी न झेलनी पड़े।
फिलहाल पूरा मामला प्रशासनिक निगरानी में है और जांच जारी है। लेकिन मलिहाबाद का यह विवाद अब सिर्फ एक गांव का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह यूपी की सामाजिक और राजनीतिक संरचना पर भी बड़ा असर डाल सकता है।

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