गुजरात के मेहसाणा ज़िले का छोटा सा कस्बा वडनगर। वहां का काला वासुदेव चौक, और उसी चौक में खपरैल की छत वाला एक छोटा सा मकान। यही वो घर था, जहां 17 सितंबर 1950 को नरेंद्र मोदी का जन्म हुआ था। 8 लोगों के बड़े परिवार को एक कमरे के घर में गुज़ारा करना पड़ता था। बरसात में जब छत से पानी टपकता, तो हीराबा बर्तन लगाती जातीं और नन्हें नरेंद्र मां की मदद को दौड़ पड़ते।
पिता दामोदरदास रेलवे स्टेशन के बाहर चाय की दुकान चलाते थे। नरेंद्र अक्सर वहां पिता का हाथ बंटाते। लेकिन इतनी आमदनी परिवार की ज़रूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। ऐसे में हीराबा घर-घर जाकर बर्तन मांजतीं और मजदूरी करतीं। मोदी ने कई मौकों पर स्वीकार किया है कि जब भी वे इन दिनों को याद करते हैं, तो भावुक हो जाते हैं।
यही वो क्षण था, जब राष्ट्रवाद की विचारधारा उनके मन में गहरी जड़ें जमाने लगी। मोदी ने किशोरावस्था में अपना उपनाम ‘अनिकेत’ रख लिया था, जिसका अर्थ है, जिसका कोई घर न हो। उनकी बिरादरी में विवाह परंपरा तीन चरणों में होती थी, कम उम्र में सगाई, 13-14 की उम्र में विवाह और वयस्क होने पर गौना। इसी परंपरा के तहत नरेंद्र का विवाह ब्राह्मणवाड़ा गांव की जशोदाबेन से हुआ। लेकिन गौना होना बाकी था। युवा नरेंद्र का मन घर की सीमाओं में टिकता नहीं था। वे अक्सर मां से कहते,
लेकिन पिता को ये वैराग्य परेशान करता, जबकि मां बेटे की बेचैनी को समझती थीं। जिसके बाद नरेंद्र ने घर छोड़ दिया और जा पहुंचे रामकृष्ण मिशन, बेलूर मठ। वहां से उन्होंने राजस्थान, दिल्ली, पूर्वोत्तर और आखिर में हिमालय का रुख किया।
सोमनाथ से मुंबई तक यात्रा का सफल संचालन उन्होंने ही किया। दो साल बाद मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा में भी मोदी दूसरे प्रमुख नेता रहे। 24 जनवरी 1992 को जम्मू में दिया गया उनका भाषण खासा चर्चित हुआ। उस समय गुजरात बीजेपी दो धड़ों, शंकर सिंह वाघेला और केशुभाई पटेल में बंटी थी। मोदी केशुभाई को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।1995 में खींचतान बढ़ने पर पार्टी नेतृत्व ने मोदी को दिल्ली बुला लिया और राष्ट्रीय सचिव बना दिया…. 1 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी दिल्ली में थे, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें बुलाया। अटलजी ने हंसते हुए कहा, “दिल्ली का पंजाबी खाना खाकर तुम मोटे हो गए हो, अब गुजरात वापस जाओ।” मोदी को तब तक अंदाजा नहीं था कि वे मुख्यमंत्री बनाए जाने वाले हैं।
7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
इस मौके पर मां हीराबा भी मंच पर आशीर्वाद देने पहुंचीं। मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही महीने बाद 2002 में गुजरात दंगे हुए। मोदी पर आरोप लगे कि सरकार ने हिंसा रोकने में ढिलाई बरती। उस समय उन्होंने कहा था
“क्रिया-प्रतिक्रिया की एक श्रृंखला चल रही है। हम चाहते हैं कि न क्रिया हो और न प्रतिक्रिया।”
इन आरोपों की जांच हुई और आखिरकार मजिस्ट्रियल कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मोदी को क्लीन चिट मिल गई। दंगों के बावजूद उन्होंने कभी डिफेंसिव रुख नहीं अपनाया। इसी दौर में उनकी छवि ‘हिंदू हृदय सम्राट’ के रूप में उभरी और आर्थिक प्रगति का ‘गुजरात मॉडल’ राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया। 2014 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। इससे पहले पार्टी अधिकतम 182 सीटें (1999) जीत पाई थी। लेकिन
मोदी के नेतृत्व में 2014 में बीजेपी ने 282 सीटों के साथ ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया और नरेंद्र मोदी भारत के 16वें प्रधानमंत्री बने।
संसद भवन की सीढ़ियों को माथे से लगाकर उन्होंने प्रवेश किया। उस क्षण को याद करते हुए वे कहते हैं,,,
“मेरे भीतर का नरेंद्र मोदी उस पल विलीन हो गया, अब मैं केवल देश के लिए जी रहा हूं।”
पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद हीराबा प्रधानमंत्री आवास पहुंचीं। एक साधारण महिला, जिसने दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर बच्चों को पाला, आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री की मां बनी थीं। ये दृश्य भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अद्वितीय था।
आजादी के बाद से अब तक केवल जवाहरलाल नेहरू उनसे अधिक समय तक प्रधानमंत्री रहे हैं। 30 दिसंबर 2022 को हीराबा का 100 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। मोदी का ये तीसरा जन्मदिन है, जब वे मां के बिना हैं। कई मौकों पर वे कहते रहे हैं कि मां ही उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा थीं।
75 वर्ष का ये सफर केवल नरेंद्र मोदी की कहानी नहीं है, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक शक्ति और सामाजिक बदलाव की गाथा है। वडनगर की तंग गलियों से निकलकर एक साधारण परिवार का बेटा न केवल गुजरात का मुख्यमंत्री बना, बल्कि तीन बार प्रचंड बहुमत से भारत का प्रधानमंत्री भी। संघर्ष, वैराग्य, संगठन कौशल और जनता से जुड़ाव… यही वे सूत्र रहे हैं जिन्होंने नरेंद्र मोदी को आज इस मुकाम तक पहुंचाया।
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