मुण्डकोपनिषद् के इस महामंत्र में उपनिषदकार हमारी दृष्टि को संसार के रूप और सीमाओं से परे ले जाते हैं। यहाँ जिस पुरुष की वन्दना है, वह आकार, जन्म, प्राण, मन तथा सभी उपाधियों से रहित है, वही परम तत्व है, वही परम् ब्रह्म है और वही परम् शिव है। यह दिव्य पुरुष न केवल बाहरी जगत में व्याप्त है, बल्कि हमारे भीतर के गूढ़तम रहस्य में भी वही नित्य और अजन्मा है। एक साथ भीतर-बाहर सर्वत्र रहते हुए वह किसी सीमा में बँधता नहीं; अमूर्त, अप्रमेय और अविनाशी है ।
भगवद्पाद भाष्यकार भगवान शंकराचार्य इस मंत्र के गूढ़ अर्थ को खोलते हुए कहते हैं कि इस पुरुष के लिए न जन्म है, न मरण; न प्राण है, न मन। वह केवल प्रकाशमय शुभ्रता है — एक अद्वैत चैतन्य, जिसमें सत्त्व, रज, तम किसी का लेश मात्र नहीं। प्राण, इन्द्रियाँ, मन ये सभी उपाधियाँ हैं, जबकि वह उपाधिरहित सत्य है।
वह “अक्षर” से भी परे है – उस अविनाशी बीज से, जिससे सृष्टि की उत्पत्ति होती है। वह माया के पार विराजमान है, और इसी कारण कहा गया है – “अक्षरात् परतः परः” – अर्थात् वह परम से भी परम है।
इस मंत्र में उपनिषद् ब्रह्म के जिस रूप का उद्घाटन करता है, वह हमारी क्षुद्र कल्पना से बहुत परे है। इसका अभिप्राय है कि शब्द, विचार, इन्द्रियों से न पकड़ में आने वाला वह सत्य, नित्य-शुद्ध, निर्विकार, सर्वव्यापी है।
भवदपादाचार्य इस गूढ़ रहस्य की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि जिस क्षण साधक उपाधियों से परे उस परम तत्व में अपनी दृष्टि एकाग्र कर लेता है, उसी क्षण उसे अपनी सच्ची सत्ता का बोध हो जाता है और वही आत्म-साक्षात्कार है।
अंततः, इस मंत्र में उपनिषद् हमें उसी अद्वैत सत्य की ओर बुला रहा है – उस निर्मल, अज, अप्राण-अमनः सत्य की ओर, जो हमारी मूल पहचान है। यही हमारे साधना-पथ का चरम लक्ष्य है, जहाँ उपासना से उपासक स्वयं उस परम पुरुष में मिल जाता है, और इस मिलन में ही जीवन का पूर्ण अर्थ साकार होता है।