उत्तर प्रदेश

Imran Masood: ‘उमर-शरजील’ को जमानत ना मिलने पर बोले इमरान मसूद, “जमानत को मौलिक अधिकार के नजरिये से देखना चाहिए”, “दोषी ठहराए बिना वर्षों तक जेल में रखना गलत है”

Imran Masood: ‘उमर-शरजील’ को जमानत ना मिलने पर बोले इमरान मसूद

 

दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश से जुड़े मामले में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने दोनों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। इस फैसले के बाद मामला एक बार फिर सिर्फ कानूनी दायरे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सियासी बहस के केंद्र में आ गया है। विपक्षी दलों की ओर से फैसले पर सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं सरकार समर्थक पक्ष इसे कानून के तहत लिया गया फैसला बता रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय पर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने जमानत को मौलिक अधिकार के नजरिये से देखने की बात कही और अदालत के फैसले पर सवाल खड़े किए। इमरान मसूद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट खुद अपने कई पूर्व फैसलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद।” ऐसे में यह देखना जरूरी है कि जिन लोगों के खिलाफ अभी ट्रायल पूरा नहीं हुआ है, उन्हें लंबे समय तक जेल में रखना क्या उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है।

कांग्रेस सांसद ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को भारतीय संविधान का मूल आधार बताते हुए कहा कि किसी भी न्यायिक फैसले में इस पहलू का संतुलित आकलन होना चाहिए। उनका कहना था कि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराए बिना वर्षों तक जेल में रखा जाना न्याय की भावना के खिलाफ है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि विचाराधीन कैद यानी अंडरट्रायल डिटेंशन अपने आप में देश की न्याय व्यवस्था के सामने एक गंभीर चुनौती है।

इमरान मसूद ने कहा कि अगर किसी आरोपी पर आरोप सिद्ध हुए बिना ही उसे लंबे समय तक जेल में रखा जाता है, तो यह संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर सवाल खड़ा करता है। उन्होंने माना कि राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, लेकिन इनकी आड़ में नागरिक अधिकारों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। उनके मुताबिक, सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में प्रतिक्रियाओं का दौर तेज हो गया है। विपक्षी दलों के एक वर्ग का कहना है कि यह फैसला अत्यधिक कठोर है और इससे लंबे समय से जेल में बंद आरोपियों के अधिकारों पर असर पड़ता है। विपक्ष का तर्क है कि जमानत याचिका पर फैसला करते समय अदालत को इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि आरोपी कितने समय से हिरासत में है और ट्रायल की प्रगति क्या है।

वहीं, सरकार समर्थक नेताओं और संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन किया है। उनका कहना है कि यह मामला बेहद गंभीर आरोपों से जुड़ा हुआ है और इसमें देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़े पहलू शामिल हैं। ऐसे मामलों में अदालत को जांच एजेंसियों द्वारा पेश किए गए तथ्यों और सबूतों को ध्यान में रखकर ही फैसला करना होता है। उनका तर्क है कि अदालत ने कानून के दायरे में रहते हुए ही निर्णय दिया है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला अब केवल उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत तक सीमित नहीं रहा है। यह उस व्यापक बहस को सामने ला रहा है, जिसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन की बात होती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट पूर्व में कई मामलों में लंबी विचाराधीन कैद पर चिंता जता चुका है और ट्रायल में देरी को गंभीर समस्या माना है।

हालांकि, विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA जैसे कड़े कानूनों के तहत जमानत की शर्तें सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में कहीं ज्यादा सख्त होती हैं। इस कानून के तहत अदालत को यह संतुष्टि करनी होती है कि प्रथम दृष्टया आरोपी के खिलाफ लगे आरोप सही नहीं हैं, जो जमानत को कठिन बना देता है।

दिल्ली दंगों से जुड़े इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला एक बार फिर इस बहस को तेज कर रहा है कि आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कानूनों के तहत न्याय और स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे साधा जाए। राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और कानूनी व्याख्याओं के बीच यह मुद्दा लगातार चर्चा में बना हुआ है।

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