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सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण पर चला बड़ा दांव

समाजवादी पार्टी में संगठनात्मक स्तर पर एक अहम बदलाव करते हुए सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सीमा राजभर को समाजवादी महिला सभा का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया है। इस फैसले को पार्टी की रणनीतिक राजनीति के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें पिछड़े वर्ग और महिलाओं दोनों को साधने की कोशिश साफ नजर आती है। यह घोषणा ऐसे समय में की गई है जब भाजपा लगातार सपा पर महिला विरोधी होने का आरोप लगा रही है।

सीमा राजभर को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर सपा ने एक साथ कई राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। पहला, पार्टी ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि वह पिछड़े समाज के नेतृत्व को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। दूसरा, महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर भी खुद को मजबूत स्थिति में दिखाने की रणनीति अपनाई गई है। इस कदम के जरिए सपा ने अपने ‘पीडीए’—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—फॉर्मूले को और धार देने की कोशिश की है।

इससे पहले भी अखिलेश यादव ने यूपी में महिला सभा के प्रदेश अध्यक्ष पद पर रूकमणी निषाद को नियुक्त किया था, जो निषाद समाज से आती हैं। रुकमणी निषाद, चर्चित दस्यु और पूर्व सांसद फूलन देवी की बहन हैं। इस नियुक्ति को भी निषाद समाज में सपा की पकड़ मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम माना गया था।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सपा का यह कदम सीधे तौर पर भाजपा के सहयोगी दलों और उनके नेताओं को चुनौती देने के तौर पर भी देखा जा सकता है। खासकर ओम प्रकाश राजभर, जो राजभर समाज के प्रमुख नेता माने जाते हैं, और संजय निषाद, जो निषाद समाज पर अपनी पकड़ का दावा करते हैं। दोनों ही नेता वर्तमान में भाजपा के साथ गठबंधन में हैं और यूपी सरकार का हिस्सा हैं।

सीमा राजभर की नियुक्ति के जरिए सपा ने अवध से लेकर पूर्वांचल और बिहार सीमा तक फैले राजभर समुदाय को साधने की रणनीति बनाई है। उत्तर प्रदेश की करीब 10 लोकसभा और 30 से अधिक विधानसभा सीटों पर इस समाज का प्रभाव निर्णायक माना जाता है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में जब ओम प्रकाश राजभर ने भाजपा से अलग होकर सपा के साथ गठबंधन किया था, तब कई सीटों पर भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा था, खासकर मऊ, गाजीपुर और अंबेडकरनगर जैसे जिलों में।

लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान अखिलेश यादव ने ‘पीडीए’ का नारा दिया था, जिसके जरिए उन्होंने पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एकजुट करने की कोशिश की। यही सामाजिक समीकरण उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। सपा अब उसी रणनीति को संगठन के भीतर लागू करते हुए नए चेहरे सामने ला रही है।

पहले समाजवादी महिला सभा के राष्ट्रीय और प्रदेश अध्यक्ष पदों पर अगड़ी जातियों का वर्चस्व रहा करता था। लेकिन अब पार्टी ने इस परंपरा को तोड़ते हुए पिछड़े वर्ग की महिलाओं को इन पदों पर नियुक्त किया है। पहले रूबी श्रीवास्तव की जगह रुकमणी निषाद को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया और अब जूही सिंह को हटाकर सीमा राजभर को राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

सपा की यह रणनीति कहीं न कहीं उस सामाजिक इंजीनियरिंग की याद दिलाती है, जिसकी नींव पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने रखी थी। उन्होंने फूलन देवी को राजनीति में लाकर निषाद, केवट और मल्लाह समाज को सपा के साथ जोड़ने का काम किया था। अब उसी तर्ज पर अखिलेश यादव नए सामाजिक समीकरण गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम को आगामी चुनावों की तैयारी के तौर पर भी देखा जा रहा है, जहां सपा अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने के साथ-साथ नए वर्गों को भी अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है।

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