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दिल्ली के प्राचीन गोरखनाथ मंदिर पर हुई सरकारी कार्रवाई, तोड़फोड़, घेराबंदी और बिजली-पानी कटने से श्रद्धालु आहत

दिल्ली के प्राचीन गोरखनाथ मंदिर पर हुई सरकारी कार्रवाई

 

दिल्ली के झंडेवाला क्षेत्र में स्थित प्राचीन गुरु गोरखनाथ परंपरा से जुड़े सिद्ध स्थल—बाबा पीर रत्ननाथ मंदिर में शुक्रवार को अचानक सरकारी कार्रवाई को अंजाम दिया गया, उसने पूरे इलाके में तनाव जैसा माहौल बना दिया। सूत्रों का कहा है कि, दिल्ली सरकार के निर्देश पर प्रशासनिक टीम, पैरामिलिट्री फोर्स और दिल्ली पुलिस ने मिलकर मंदिर परिसर को चारों ओर से घेर लिया और इसके बाद तोड़फोड़ की प्रक्रिया शुरू कर दी।

मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, ये कार्रवाई किसी पूर्व सूचना या संवाद के बिना की गई। यही वजह है कि, स्थानीय श्रद्धालुओं और सेवायतों में गहरी नाराज़गी देखी जा रही है। इस स्थल की पौराणिकता को लेकर दावा किया जाता है कि, ये स्थान लगभग 1,400 वर्ष प्राचीन है और यहां राम-नाम की अखंड ज्योत सदियों से जल रही है। इसी वजह से इसे नाथ पंथ के साधकों के लिए अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता है।

श्रद्धालु और सेवक बताते हैं कि, कार्रवाई के दौरान अधिकारियों ने मंदिर की बिजली और पानी की सप्लाई भी रोक दी, जिससे नियमित पूजा-पाठ, आरती, भोग और अन्य धार्मिक परंपराएं प्रभावित हुईं। सेवा में लगे लोगों का कहना है कि, पानी और भोजन की व्यवस्था बाधित होने से मंदिर में दैनिक ‘सेवा’ करना मुश्किल हो गया

सबसे बड़ी बात ये कि, विवादित ज़मीन और मंदिर से जुड़ा मामला दिल्ली हाई कोर्ट में विचाराधीन बताया जाता है। ऐसे में, अदालत के अंतिम निर्णय आने से पहले सरकारी मशीनरी द्वारा अचानक कार्रवाई किए जाने पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि, कोर्ट के समक्ष मामला लंबित होने के बावजूद तोड़फोड़ करना “धार्मिक परंपराओं के प्रति असंवेदनशीलता” को दर्शाता है

मंदिर से जुड़े अनेक श्रद्धालुओं ने इसे आस्था पर चोट और सांस्कृतिक विरासत के साथ खिलवाड़ बताया है। लोगों का तर्क है कि, अगर किसी प्रकार की जमीन सम्बन्धी जांच या कार्यवाही आवश्यक थी, तो इसे संवाद और प्रक्रिया के ज़रिये भी किया जा सकता था।

कई भक्तों का कहना है कि, इतने पुराने पवित्र स्थल को “अतिक्रमण” बताकर हटाना या नुकसान पहुंचाना उचित नहीं है क्योंकि ये केवल एक प्रतिष्ठान नहीं, बल्कि लाखों लोगों की भावनाओं का केंद्र है।

स्थानीय निवासियों और भक्त-समूहों ने प्रशासन से मांग की है कि, कार्रवाई को तुरंत रोका जाए और मंदिर की परंपराओं तथा श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं का सम्मान किया जाए। कुछ लोगों ने ये भी कहा कि, इस विवाद को राजनीतिक रंग देने या किसी समुदाय विशेष के खिलाफ मुद्दा बनाने की बजाय तथ्यात्मक और संवेदनशील तरीके से हल निकालना ही बेहतर होगा।

इस घटना से मंदिर के आस-पास के इलाके में असमंजस की स्थिति भी बनी हुई है। कई लोग ये समझने की कोशिश कर रहे हैं कि, इतनी पुरानी धरोहर पर अचानक कार्रवाई क्यों की गई और इसका लक्ष्य क्या था। लोगों की यही भी चिंता है कि, अगर ऐतिहासिक मंदिरों और प्राचीन धार्मिक स्थलों पर इस तरह की कार्रवाइयां होती रहीं, तो ये देश की सांस्कृतिक विरासत को गहरा नुकसान पहुंचा सकती हैं।

मंदिर से जुड़े समुदाय का कहना है कि, पीर रत्ननाथ स्थल केवल एक धार्मिक स्थान नहीं, बल्कि सदियों पुरानी नाथ परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां आने वाले साधक और भक्त वर्षों से मानसिक व आध्यात्मिक शांति के लिए इसे अपना सहारा मानते रहे हैं। ऐसे में, अचानक सरकारी हस्तक्षेप से उपजा विवाद केवल एक स्थानीय मसला नहीं, बल्कि व्यापक भावनात्मक असर रखने वाला है।

फिलहाल पूरा मामला न्यायालय में है और लोगों की नजर आगामी सुनवाई पर टिक गई है। श्रद्धालुओं को उम्मीद है कि, अदालत और प्रशासन दोनों ही पक्ष स्थल की ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को ध्यान में रखकर संवेदनशील निर्णय लेंगे। भक्तों का कहना है कि, उनके लिए ये स्थान “धार्मिक विरासत का जीवित प्रतीक” है, और वे चाहते हैं कि, इसे सुरक्षित रखा जाए तथा उसकी परंपराओं को बिना बाधा के जारी रहने दिया जाए।

Lata Rani

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