टोंक में बीजेपी गुटों की भिड़ंत मंत्री के स्वागत में हुआ सियासी तमाशा,जानिए पूरा मामला

टोंक में बीजेपी गुटों की भिड़ंत मंत्री के स्वागत में हुआ सियासी तमाशा,जानिए पूरा मामला

टोंक। राजस्थान के टोंक जिले में बुधवार को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की आंतरिक गुटबाजी एक बार फिर खुलकर सामने आ गई। मामला उस समय गरमा गया जब सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के मंत्री अविनाश गहलोत के स्वागत के दौरान बीजेपी के ही दो गुटों के बीच कहासुनी हो गई, जो देखते ही देखते टकराव में बदल गई। यह घटना न केवल संगठनात्मक अनुशासन पर सवाल खड़े करती है, बल्कि आगामी स्थानीय रणनीति को भी प्रभावित कर सकती है।

मंत्री के आगमन पर बढ़ा तनाव

बुधवार दोपहर करीब 3 बजे मंत्री अविनाश गहलोत टोंक की अग्रवाल धर्मशाला पहुंचे थे। उनका स्वागत करने के लिए जिले भर से बीजेपी नेता और कार्यकर्ता जुटे थे। इसी दौरान बरवास मंडल अध्यक्ष जितेंद्र गुर्जर और मेहंदवास मंडल अध्यक्ष धर्मराज चौधरी ने मंत्री से शिकायत की कि उनके क्षेत्र में दो-दो कार्यक्रम हुए, लेकिन उन्हें इसकी कोई सूचना नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि संगठन इस तरह कैसे चलेगा जब मंडल अध्यक्षों को ही कार्यक्रमों से अंधेरे में रखा जाएगा।

जिलाध्यक्ष समर्थकों से बढ़ा विवाद

मंत्री अविनाश गहलोत ने इस शिकायत पर आगे बात करने का आश्वासन देकर आगे बढ़ने की कोशिश की, लेकिन तभी विवाद और अधिक बढ़ गया। जिलाध्यक्ष चंद्रवीर सिंह चौहान के समर्थक और बीजेपी कार्यकर्ता शैलेन्द्र चौधरी ने मंडल अध्यक्षों को मामले को यहीं खत्म करने की सलाह दी। इस पर जितेंद्र गुर्जर और धर्मराज चौधरी भड़क उठे, और दोनों पक्षों में तीखी बहस शुरू हो गई।

हाथापाई की नौबत, पहुंची पुलिस

देखते ही देखते मामला गरमा गया और दोनों गुटों के कार्यकर्ता आमने-सामने आ गए। एक-दूसरे को धमकाने का दौर शुरू हुआ और बहस इतनी तेज़ हो गई कि हाथापाई की नौबत आ गई। मौके पर मौजूद अन्य कार्यकर्ताओं ने स्थिति को संभालते हुए दोनों पक्षों को अलग किया। थोड़ी ही देर में स्थानीय पुलिस भी मौके पर पहुंच गई और स्थिति को नियंत्रण में लिया।

संगठन पर उठे सवाल

इस घटना ने टोंक जिले में बीजेपी की अंदरूनी कलह और गुटबाजी को एक बार फिर उजागर कर दिया है। संगठन के भीतर सूचना तंत्र की कमी, आपसी संवाद की कमी और नेतृत्व के स्तर पर पारदर्शिता की कमी जैसे मुद्दे अब सतह पर आ गए हैं। इस तरह के विवाद न केवल पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि आगामी चुनावों और जनसंपर्क अभियानों पर भी असर डाल सकते हैं।

टोंक में हुआ यह घटनाक्रम बीजेपी के लिए एक चेतावनी है कि संगठनात्मक एकता और अनुशासन को प्राथमिकता देना अब और जरूरी हो गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व को चाहिए कि वह ऐसे मामलों को गंभीरता से ले और गुटबाजी पर लगाम लगाए, ताकि कार्यकर्ताओं का विश्वास बना रहे और पार्टी की जन छवि को नुकसान न पहुंचे। टोंक की घटना भले ही छोटी दिखे, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थ गहरे हो सकते हैं।

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