श्रीगंगानगर। राजस्थान का श्रीगंगानगर जिला आज कृषि उत्पादन के लिए देशभर में जाना जाता है। गेहूं, सरसों और कपास जैसी फसलें यहां की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार हैं। लेकिन करीब सौ साल पहले इस क्षेत्र की परिस्थितियां बिल्कुल अलग थीं।
उस समय श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ का बड़ा हिस्सा बीकानेर रियासत के अंतर्गत आता था। कम बारिश, रेतीली जमीन और सिंचाई के साधनों की कमी के कारण खेती करना बेहद मुश्किल था।
वर्ष 1899-1900 में पड़े भीषण अकाल ने बीकानेर रियासत को बुरी तरह प्रभावित किया। पानी और अनाज की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोगों को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
इस अकाल ने महाराजा गंगासिंह को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए स्थायी सिंचाई व्यवस्था विकसित करने का संकल्प लिया।
सतलुज नदी का पानी लाने का बनाया मास्टरप्लान
महाराजा गंगासिंह ने महसूस किया कि केवल बारिश के भरोसे रेगिस्तानी इलाकों का विकास संभव नहीं है। उन्होंने पंजाब से बहने वाली सतलुज नदी के पानी को नहर के माध्यम से बीकानेर रियासत तक पहुंचाने की योजना बनाई।
हालांकि, सतलुज से सिंचाई का विचार पहले भी सामने आ चुका था, लेकिन तकनीकी और राजनीतिक कारणों से इस पर काम आगे नहीं बढ़ सका था।
वर्ष 1903 में महाराजा गंगासिंह ने इंजीनियर ए.डब्ल्यू.ई. स्टैंडली की सेवाएं लीं। उन्हें सतलुज नदी से बीकानेर के शुष्क क्षेत्रों तक पानी पहुंचाने की संभावनाओं का अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी गई।
इसके बाद पंजाब के तत्कालीन मुख्य अभियंता आर.जी. कैनेडी ने परियोजना की तकनीकी योजना तैयार की।
बहावलपुर रियासत के विरोध ने बढ़ाई मुश्किलें
गंग नहर परियोजना की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक पानी के बंटवारे को लेकर राजनीतिक विवाद था।
उस समय सतलुज नदी के पानी पर पंजाब और बहावलपुर रियासत के हित भी जुड़े हुए थे। बहावलपुर रियासत की आपत्तियों के कारण परियोजना को आगे बढ़ाने में लंबा समय लगा।
महाराजा गंगासिंह ने ब्रिटिश सरकार के सामने लगातार इस परियोजना की आवश्यकता रखी। उनका तर्क था कि सिंचाई के बिना बीकानेर के बड़े रेगिस्तानी क्षेत्र में स्थायी कृषि विकास संभव नहीं होगा।
आखिरकार लंबे प्रयासों के बाद 4 सितंबर 1920 को पंजाब, बहावलपुर और बीकानेर के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ। इस समझौते ने गंग नहर के निर्माण का रास्ता साफ कर दिया।
5 दिसंबर 1925 को रखी गई गंग नहर की आधारशिला
राजनीतिक सहमति मिलने के बाद महाराजा गंगासिंह ने परियोजना को जमीन पर उतारने की दिशा में काम तेज किया।
5 दिसंबर 1925 को पंजाब के फिरोजपुर में गंग नहर परियोजना के हेडवर्क्स की आधारशिला रखी गई।
परियोजना के तहत लगभग 89 मील यानी 143 किलोमीटर लंबी मुख्य नहर का निर्माण किया गया। इसके जरिए सतलुज नदी का पानी बीकानेर रियासत के शुष्क इलाकों तक पहुंचाया जाना था।
इस विशाल परियोजना के लिए उस समय करीब 5.5 करोड़ रुपये की लागत का अनुमान लगाया गया था। वित्तीय संसाधन जुटाना भी एक बड़ी चुनौती थी। बीकानेर रियासत ने इसके लिए ऋण सहित विभिन्न माध्यमों से धन की व्यवस्था की।
26 अक्टूबर 1927 को रेगिस्तान में पहुंचा सतलुज का पानी
करीब दो वर्षों के निर्माण कार्य के बाद गंग नहर परियोजना पूरी हुई।
26 अक्टूबर 1927 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने गंग नहर का औपचारिक उद्घाटन किया। यह दिन बीकानेर रियासत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया।
नहर के उद्घाटन से जुड़ा एक ऐतिहासिक प्रसंग भी चर्चित है। विवरणों के अनुसार, उद्घाटन समारोह के दौरान महाराजा गंगासिंह ने स्वयं हल चलाया और महारानी ने खेत में मोती बोए।
यह समारोह रेगिस्तान की भूमि को कृषि योग्य बनाने की उम्मीद का प्रतीक था।
गंग नहर ने बदल दी श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ की तस्वीर
गंग नहर के निर्माण के बाद क्षेत्र में सिंचाई की सुविधाओं का विस्तार हुआ। जहां पहले पानी की कमी के कारण खेती सीमित थी, वहां नहरों के जरिए नियमित सिंचाई संभव होने लगी।
खेती के अवसर बढ़ने के साथ पंजाब के कई किसान परिवार भी इस क्षेत्र में आकर बसने लगे। नई कृषि बस्तियां विकसित हुईं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदलाव आया।
नहर प्रणाली के साथ सड़कों, रेलवे और कृषि मंडियों जैसी सुविधाओं का भी विकास हुआ।
समय के साथ श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ राजस्थान के महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्रों के रूप में उभरे। यही कारण है कि श्रीगंगानगर को आज राजस्थान का ‘अन्न का कटोरा’ भी कहा जाता है।
महाराजा गंगासिंह के नाम पर बसा श्रीगंगानगर शहर
गंग नहर परियोजना के साथ एक नए शहर के विकास की योजना भी तैयार की गई।
इस क्षेत्र में पहले रामू की ढाणी नाम की छोटी बस्ती थी, जिसे बाद में रामनगर कहा जाने लगा। नहर परियोजना के विस्तार के साथ इस क्षेत्र का नियोजित विकास किया गया।
बाद में महाराजा गंगासिंह के सम्मान में शहर का नाम श्रीगंगानगर रखा गया।
शहर की योजना में चौड़ी सड़कों और व्यवस्थित बसावट पर विशेष ध्यान दिया गया। ऐतिहासिक विवरणों में इसके नगर नियोजन की तुलना पेरिस से भी की जाती है।
करीब 100 साल बाद भी कायम है गंग नहर का महत्व
गंग नहर का उद्घाटन 26 अक्टूबर 1927 को हुआ था। इस हिसाब से 26 अक्टूबर 2026 को इसके संचालन की ऐतिहासिक शुरुआत के 99 वर्ष पूरे होंगे।
आज भी यह नहर प्रणाली उत्तर राजस्थान की सिंचाई व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। समय के साथ बढ़ती कृषि जरूरतों को देखते हुए इसके आधुनिकीकरण और पुनर्निर्माण पर भी काम किया जा रहा है।
दिसंबर 2025 में राजस्थान सरकार ने फिरोजपुर फीडर के पुनर्निर्माण की 670 करोड़ रुपये की परियोजना की आधारशिला रखी थी। इसका उद्देश्य जल वहन क्षमता बढ़ाना और श्रीगंगानगर तथा हनुमानगढ़ के किसानों को बेहतर सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना है।
महाराजा गंगासिंह की दूरदर्शिता ने रचा इतिहास
महाराजा गंगासिंह का गंग नहर निर्माण का फैसला केवल एक सिंचाई परियोजना तक सीमित नहीं था। इसने रेगिस्तानी क्षेत्र में कृषि, बसावट, व्यापार और आर्थिक गतिविधियों के विकास की बुनियाद रखी।
जिस क्षेत्र में कभी अकाल और पानी की कमी सबसे बड़ी चुनौतियां थीं, वहां नहरों के जरिए खेती का विस्तार हुआ और हजारों परिवारों की आजीविका के नए रास्ते खुले।
आज श्रीगंगानगर के खेत और कृषि मंडियां उस ऐतिहासिक परिवर्तन की याद दिलाते हैं, जिसकी शुरुआत महाराजा गंगासिंह ने करीब एक सदी पहले की थी।
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