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Big decision of Rajasthan High Court: राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, निजी स्थान में हुई जातिसूचक गाली-गलौज पर SC/ST एक्ट लागू नहीं

Big decision of Rajasthan High Court: राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट ने SC/ST एक्ट के तहत एक अहम फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी निजी स्थान पर घटित जातिसूचक गाली-गलौज या अपमान को कानून की दृष्टि में ‘सार्वजनिक दृष्टि’ में किया गया कृत्य नहीं माना जाएगा। जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने 1994 में SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(x) के तहत सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया। यह फैसला SC/ST एक्ट की व्याख्या और उसकी सीमा को लेकर महत्वपूर्ण है और इसके प्रभाव दूरगामी हो सकते हैं।

मामला एक वाहन शोरूम संचालक से जुड़ा था, जिस पर आरोप था कि उसने ग्राहक के साथ जातिसूचक गाली-गलौज की और मारपीट की। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए SC/ST एक्ट के तहत सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह पाया कि घटना शोरूम के भीतर सीमित रही और कोई स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह मौजूद नहीं था।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ‘सार्वजनिक दृष्टि’ का अर्थ केवल यह नहीं कि वहां एक से अधिक लोग मौजूद हों। इसके लिए आवश्यक है कि कथित अपमान या धमकी ऐसी जगह हुई हो, जहां आम लोग उसे देख या सुन सकें। यदि यह पूरी तरह निजी क्षेत्र या बंद स्थान में हुआ है, तो SC/ST एक्ट की धारा लागू नहीं होती। मामले में आरोपी और शिकायतकर्ता के अलावा कोई स्वतंत्र व्यक्ति घटना का गवाह नहीं था।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस विवाद की प्रकृति व्यावसायिक थी। शिकायतकर्ता ने शोरूम से लोन पर मोटरसाइकिल खरीदी थी, और भुगतान से जुड़े विवाद के कारण बहस हुई। शोरूम के भीतर दोनों पक्षों के बीच हुई गाली-गलौज और विवाद का संबंध सीधे लेन-देन से था और इसे सार्वजनिक दृष्टि वाला कृत्य नहीं माना जा सकता।

इस निर्णय के बाद ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि हालांकि SC/ST एक्ट की धारा लागू नहीं हो सकती, लेकिन आरोपी के खिलाफ अन्य कानूनों के तहत कार्रवाई की संभावना बनी रहती है। हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि यह फैसला केवल धारा 3(1)(x) के दायरे को सीमित करता है और इसे अन्य अपराधों पर लागू नहीं किया जा सकता।

फैसले के दौरान जस्टिस फरजंद अली ने यह कहा कि कानून का उद्देश्य केवल न्याय सुनिश्चित करना नहीं है, बल्कि उसका सही ढंग से और सटीक तरीके से लागू होना भी जरूरी है। यदि किसी अपराध के सभी तत्व पूरे नहीं होते, तो न्यायपालिका को अनुचित सजा नहीं सुनानी चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला SC/ST एक्ट के दायरे में आने वाली घटनाओं की पहचान और व्याख्या को लेकर एक महत्वपूर्ण दिशा देगा। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि एक्ट केवल उन मामलों पर लागू होगा, जो वास्तविक रूप में सार्वजनिक दृष्टि में घटित हों। निजी संपत्ति या बंद स्थान में घटित घटनाओं में इसका प्रयोग नहीं किया जा सकता।

कानूनी जानकारों का कहना है कि यह फैसला न्यायपालिका के उस दृष्टिकोण को भी दर्शाता है, जिसमें अपराध और घटना के प्रकार, स्थान और प्रकृति का पूरी तरह से अध्ययन किया जाता है। हाईकोर्ट ने यह मान्यता दी कि केवल आरोप लगने भर से सजा देना न्याय की भावना के अनुरूप नहीं है।

मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच विवाद शोरूम में मोटरसाइकिल के भुगतान और डिमांड ड्राफ्ट स्वीकार न करने को लेकर हुआ था। दोनों पक्षों के बीच बहस और गाली-गलौज निजी रूप से हुई। कोई स्वतंत्र गवाह या आम जनता मौजूद नहीं थी। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में SC/ST एक्ट का उद्देश्य पूरी तरह अधूरा हो जाएगा यदि इसे निजी विवादों पर भी लागू किया जाए।

हाईकोर्ट के इस फैसले से यह संदेश गया कि कानून की सही व्याख्या और सही जगह पर उसका प्रयोग होना अत्यंत आवश्यक है। SC/ST एक्ट जैसी संवेदनशील धाराओं का दुरुपयोग रोकना न्यायपालिका की प्राथमिकता है। निर्णय ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून के दायरे को सीमित करने से अपराधियों को संरक्षण नहीं मिलता, बल्कि यह न्याय प्रक्रिया को सटीक बनाता है।

इस फैसले का प्रभाव भविष्य में ऐसे कई मामलों में देखा जा सकता है, जहां निजी स्थान पर घटित जातिसूचक अपमान या विवाद को लेकर SC/ST एक्ट का प्रयोग किया जाता रहा है। अब न्यायपालिका इस बात को ध्यान में रखेगी कि आरोपी और पीड़ित के अलावा कोई स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह मौजूद हो या घटना सार्वजनिक दृष्टि में हुई हो।

राजस्थान हाईकोर्ट का यह निर्णय कानून की व्याख्या, न्याय की स्पष्टता और SC/ST एक्ट के सही इस्तेमाल के लिए मिसाल माना जा रहा है। यह फैसला न्यायविदों और कानूनी विशेषज्ञों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है, ताकि भविष्य में ऐसे मामलों में न्यायिक दिशा स्पष्ट हो।

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