जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में कानपुर के शुभम द्विवेदी की धर्म के आधार पर की गई निर्मम हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस दर्दनाक घटना ने न सिर्फ एक परिवार को उजाड़ दिया, बल्कि पूरे कानपुर को गुस्से और ग़म के तूफान में झोंक दिया है। मंगलवार को हुए इस हमले में शुभम अपने परिवार के 11 सदस्यों के साथ कश्मीर घूमने गए थे, जहां टूरिस्टों पर आतंकी हमला किया गया। शुभम की पत्नी ऐशान्या ने जो मंजर बयां किया, वह रूह कंपा देने वाला है।
ऐशान्या ने रोते हुए बताया कि वह और शुभम बैठकर मैगी खा रहे थे, तभी एक व्यक्ति आया और सवाल किया कि हिंदू हो या मुसलमान। जब शुभम ने कहा कि वह हिंदू है, तो उस आतंकी ने तुरंत गोली चला दी। ऐशान्या ने खुद को भी गोली मारने की गुहार लगाई, लेकिन आतंकियों ने इंकार कर दिया और कहा, ‘जाकर अपनी सरकार को बता देना कि हमने क्या किया।’
फरवरी में हुई शादी के बाद पहली बार दोनों परिवार के साथ छुट्टियों पर गए थे। किसी को अंदाजा नहीं था कि ये यात्रा मातम में बदल जाएगी। शुभम की मौत के बाद ऐशान्या बेसुध हैं और पति की लाश के पास से हटने को तैयार नहीं।
शुभम की हत्या के बाद हाथीपुर गांव में मातम पसरा है। हर आंख नम है और हर चेहरा आक्रोश से भरा हुआ। शुभम के पिता ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलते हुए फूट-फूटकर कहा, “मेरे बेटे का कसूर क्या था? उसे क्यों मारा गया?” मुख्यमंत्री ने परिवार को हर संभव मदद का आश्वासन दिया, लेकिन गांववालों की मांग है—“अब सिर्फ आश्वासन नहीं, एक्शन चाहिए।”
शुभम के दोस्त प्रशांत और आशुतोष भी अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे। प्रशांत ने टीवी9 डिजिटल से बातचीत में कहा, “शुभम मेरा हीरा था। वह हमेशा मुस्कुराने वाला, सबका साथ देने वाला इंसान था। उसकी शहादत व्यर्थ नहीं जानी चाहिए।” आशुतोष ने भावुक होकर कहा, “आतंकियों ने कहा था मोदी को बता देना… अब मोदी को जवाब देना चाहिए।”
कानपुर के कई इलाकों में दुकानों को स्वतः बंद कर प्रदर्शन हो रहे हैं। युवाओं के हाथों में तख्तियां हैं— ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’, ‘शुभम को न्याय दो’, ‘आतंक का अंत करो’। लोग मांग कर रहे हैं कि पाकिस्तान को इस हमले की बड़ी कीमत चुकानी चाहिए, और आतंक के खिलाफ निर्णायक युद्ध अब टाला नहीं जाना चाहिए।
सरकार द्वारा पहले ही पाकिस्तान के खिलाफ कई राजनयिक फैसले लिए जा चुके हैं—जैसे कि दूतावास बंद करना, वीज़ा रद्द करना और बॉर्डर सील करना। अब देशवासी पूछ रहे हैं: क्या अब जवाब सिर्फ कूटनीतिक होगा या सैन्य भी?
कुल मिलाकर, शुभम की शहादत अब एक प्रतीक बन चुकी है—आतंक के खिलाफ आखिरी लड़ाई का। देश गूंज रहा है: “अब की बार… आर या पार!”
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