उत्तराखण्ड

‘खूनी गांव’: उत्तराखंड के ‘खूनी गांव’ का नाम हुआ ‘देवीग्राम’, गांव का नाम ‘खूनी’ पड़ने के पीछे थी एक कहानी, स्थानीय लोगों की दशकों पुरानी मांग हो गई पूरी

‘खूनी गांव’: उत्तराखंड के ‘खूनी गांव’ का नाम हुआ ‘देवीग्राम’

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित एक छोटे से गांव की पहचान अब बदल गई है, और इसके पीछे की कहानी जितनी दिलचस्प है, उतनी ही सामाजिक रूप से संवेदनशील भी। पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित विकास खंड विण की ग्राम पंचायत का नाम वर्षों से ‘खूनी’ था। नाम सुनते ही जहां एक ओर किसी अपराध या हिंसा की कल्पना मन में आती थी,

वहीं इस गांव के लोग इस नाम के कारण लगातार असहजता और शर्मिंदगी का सामना कर रहे थे। लेकिन अब सरकार की मंजूरी के बाद इस गांव को नया नाम मिल गया है… देवीग्राम।

गांव का नाम खूनी होने की वजह से यहां के निवासियों को सामाजिक, मानसिक और यहां तक कि प्रशासनिक स्तर पर भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता था। सरकारी कागज़ों में जब इस गांव का नाम दर्ज किया जाता, तो न केवल बाहर के लोग चौंक जाते, बल्कि कई बार इसका मजाक भी उड़ाया जाता। यही कारण था कि गांव के निवासी लंबे समय से इस नाम को बदलवाने की मांग कर रहे थे।

गांव के बुजुर्गों और स्थानीय निवासियों के मुताबिक, इस नाम के पीछे कई लोककथाएं प्रचलित हैं। कुछ लोगों का कहना है कि, आज़ादी से पहले जब अंग्रेज इस गांव में आए थे, तो स्थानीय लोगों के साथ उनका टकराव हुआ। गांव वालों ने अंग्रेजों से लड़ाई की और उन्हें मार गिराया।

इस घटना के बाद गांव को ‘खूनी’ नाम दे दिया गया। वहीं कुछ अन्य लोगों का कहना है कि, पहले इस गांव का नाम ‘खोली’ था, लेकिन अंग्रेजों की उच्चारण त्रुटि के कारण ये ‘खूनी’ बन गया और इसी नाम से ये गांव दशकों से जाना जाने लगा।

नाम को लेकर असहजता इतनी बढ़ गई थी कि गांव के लोग खुद को अपने पते में ‘खूनी गांव’ लिखने से कतराने लगे थे। शादी-ब्याह, नौकरी के आवेदन या अन्य औपचारिक पत्रों में जब इस नाम का उल्लेख होता, तो लोगों को बार-बार सफाई देनी पड़ती कि, ये सिर्फ एक नाम है, इसका मतलब वो नहीं जो प्रतीत होता है। इसी वजह से गांव के बुजुर्गों, युवाओं और यहां तक कि बच्चों तक में इस नाम को लेकर हीनभावना जन्म लेने लगी थी।

इस गंभीर समस्या को लेकर ग्रामीणों ने वर्षों पहले आवाज उठाई थी। गांव के ही निवासी और ओएनजीसी के पूर्व महाप्रबंधक ललित मोहन जोशी इस मुहिम के अगुआ बने। उन्होंने लगातार राज्य सरकार और संबंधित विभागों से पत्राचार किया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से भी व्यक्तिगत मुलाकात कर इस मुद्दे को उठाया।

ललित मोहन जोशी ने बताया कि गांव में स्थित मां मलिकेशरी भगवती का मंदिर इस स्थान की धार्मिक पहचान है और इसी आधार पर गांव का नाम बदलकर ‘देवीग्राम’ रखने का प्रस्ताव सरकार को भेजा गया था।

सभी औपचारिक प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद राज्य सरकार ने गांव का नाम बदलने की अधिसूचना जारी कर दी। जैसे ही ये अधिसूचना गांव में पहुंची, वहां जश्न का माहौल बन गया। ग्रामीणों में गहरी खुशी और संतोष देखा गया।

गांव की नव निर्वाचित ग्राम प्रधान इंद्रा जोशी ने कहा, “हमारे गांव का नाम अब देवीग्राम हो गया है। दशकों पुरानी हमारी मांग पूरी हुई है। अब हमें किसी को यह नहीं बताना पड़ेगा कि हम ‘खूनी’ नाम के गांव से हैं। इससे गांव की पहचान भी बेहतर होगी और भविष्य में हमारे बच्चों को इसका बोझ नहीं उठाना पड़ेगा।”

वर्तमान में इस गांव में करीब 60 परिवार रहते हैं और जनसंख्या लगभग 380 के आसपास है। गांव की मूलभूत सुविधाओं की बात करें तो धीरे-धीरे यहां विकास की किरणें पहुंच रही हैं, लेकिन नाम को लेकर बनी मानसिक दीवार सबसे बड़ी बाधा बन गई थी। अब जब नाम बदल गया है, तो ग्रामीणों को उम्मीद है कि गांव को पर्यटन, संस्कृति और धार्मिक दृष्टि से भी पहचान मिलेगी।

ललित मोहन जोशी ने बताया कि बहुत जल्द गांव में एक विशेष आयोजन किया जाएगा, जिसमें नए नाम ‘देवीग्राम’ का विधिवत स्वागत किया जाएगा। उन्होंने ये भी इच्छा जताई कि इस अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खुद मौजूद रहें, ताकि उस संघर्ष को मान्यता मिल सके, जो गांव वालों ने वर्षों तक किया।

देवीग्राम अब केवल एक नया नाम नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सामाजिक स्वाभिमान का प्रतीक बन गया है। ये बदलाव ये भी दर्शाता है कि गांवों की पहचान केवल भौगोलिक नहीं होती, बल्कि उसका जुड़ाव उस समाज की सोच, भावनाओं और मान्यताओं से भी होता है।

Kirti Bhardwaj

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