Will the government's plan get stuck on CIC-CVC?: क्या CIC-CVC पर फंसेगा सरकार का प्लान?
लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने बुधवार को संसद भवन में महत्वपूर्ण बैठक में हिस्सा लिया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद थे। यह बैठक प्रधानमंत्री के चैंबर में लगभग सवा घंटे चली। बैठक का उद्देश्य चीफ इंफॉर्मेशन कमिश्नर (CIC), विजिलेंस कमिश्नर (CVC) और आठ नए इंफॉर्मेशन कमिश्नरों की नियुक्ति को लेकर चयन प्रक्रिया पर विचार करना था।
इस बैठक में सरकार ने जिन नामों का प्रस्ताव रखा, उन सभी नामों पर राहुल गांधी ने अपनी आपत्ति जताई और डिसेंट नोट दर्ज किया। सूत्रों के अनुसार, राहुल गांधी का कहना था कि उन्हें चयन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं लगती और वह सरकार के सुझाए नामों से सहमत नहीं हैं। चयन समिति के इस महत्वपूर्ण सत्र में राहुल ने स्पष्ट किया कि वह सरकार द्वारा भेजे गए पैनल को स्वीकार नहीं कर सकते।
यह समिति मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा-शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के प्रावधानों के तहत गठित होती है। इसमें तीन सदस्य शामिल होते हैं—प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और एक कैबिनेट मंत्री। भारत में सूचना के अधिकार, पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े इन पदों की नियुक्ति को अत्यंत संवेदनशील माना जाता है, और इसी वजह से यह बैठक बेहद महत्वपूर्ण थी।
बैठक के बाद राहुल गांधी ने सरकार पर निशाना साधते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा किया। इसमें उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा चुनाव आयोग को “वोट चोरी करने का औजार” बना रही है। उन्होंने सरकार से तीन सीधे सवाल पूछे—पहला, चयन समिति से प्रधान न्यायाधीश को बाहर क्यों किया गया? दूसरा, 2024 चुनावों से पहले चुनाव आयोग को इतनी व्यापक कानूनी सुरक्षा क्यों प्रदान की गई? और तीसरा, सीसीटीवी फुटेज को 45 दिनों में नष्ट करने की जल्दी क्यों है?
राहुल गांधी ने अपने पोस्ट में लिखा कि इन सवालों का एक ही जवाब है—सरकार चुनाव आयोग को अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल करना चाहती है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर भारत की लोकतांत्रिक अवधारणा को नुकसान पहुंचा रही है।
इससे पहले मंगलवार को लोकसभा में चुनाव सुधारों पर चर्चा के दौरान भी राहुल गांधी ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया था। उन्होंने 2023 के चुनाव कानून का हवाला देते हुए कहा था कि यह कानून चुनाव आयुक्तों को “पूर्ण अधिकार” देता है और यह लोकतांत्रिक संरचना के लिए सही नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि भविष्य में केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनती है, तो इस कानून में पूर्वव्यापी प्रभाव से संशोधन किया जाएगा।
राहुल गांधी ने यह भी कहा था कि इस कानून को बदलना जरूरी है, क्योंकि इसके जरिए सरकार ने चयन समिति से CJI को बाहर रखने का फैसला किया, जबकि न्यायपालिका की उपस्थिति चयन प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाए रखती थी। उन्होंने यहां तक कहा था कि चुनाव आयुक्तों को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए, क्योंकि वर्तमान कानून उन्हें कहीं अधिक ताकत प्रदान करता है।
बैठक में मौजूद सूत्रों ने यह भी बताया कि राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के साथ चर्चा में लगातार इस बात पर जोर दिया कि संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्ति राजनीतिक हितों से प्रभावित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने सरकार द्वारा सुझाए गए नामों पर विस्तार से आपत्ति जताई और कहा कि इन पदों पर चयन योग्यता और निष्पक्षता के आधार पर होना चाहिए।
सरकार की ओर से प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए कहा कि जिन नामों का प्रस्ताव दिया गया है, वे तय नियमों और मानदंडों के अनुरूप हैं। लेकिन राहुल गांधी का कहना था कि इन नामों पर सहमति नहीं बन सकती, क्योंकि यह नियुक्तियां जनता के हितों से सीधे जुड़ी हैं और इन्हें राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।
राहुल गांधी के इन आरोपों ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। कांग्रेस नेताओं ने उनके रुख को “लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा की लड़ाई” बताया है। वहीं, भाजपा ने कहा है कि राहुल गांधी केवल अनावश्यक विवाद खड़ा कर रहे हैं।
देश की प्रमुख संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्ति को लेकर इतनी तीखी असहमति दुर्लभ ही देखने को मिलती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आने वाले समय में और तेज हो सकता है, क्योंकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता के लिए बड़ा मुद्दा बनाए हुए है।
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