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ईरान जंग से और बढ़ जाएगी महंगाई? IMF ने जारी की बड़ी चेतावनी

अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी तनाव अब केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। लगभग एक महीने से चल रहे इस संघर्ष ने ऊर्जा बाजार, खाद्य आपूर्ति और वित्तीय स्थिरता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इसी बीच International Monetary Fund यानी IMF ने एक बड़ी चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि यह संकट आने वाले समय में और गहरा आर्थिक प्रभाव डाल सकता है।

IMF के अर्थशास्त्रियों टोबियास एड्रियन और जिहाद अजौर द्वारा जारी विश्लेषण में बताया गया है कि मौजूदा हालात पहले ही वैश्विक आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस संघर्ष का असर तीन प्रमुख माध्यमों से तेजी से फैल रहा है—ऊर्जा, खाद्य और वित्तीय बाजार। खासतौर पर ऊर्जा क्षेत्र में अस्थिरता ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को झकझोर कर रख दिया है।

इस संकट का सबसे संवेदनशील बिंदु Strait of Hormuz बना हुआ है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 25 से 30 प्रतिशत और लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी LNG का करीब 20 प्रतिशत परिवहन करता है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार की बाधा या तनाव पूरी दुनिया की सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकता है। मौजूदा अनिश्चितता के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया है और ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी है।

ऊर्जा कीमतों में इस वृद्धि का सीधा असर उन देशों पर पड़ रहा है जो तेल और गैस के आयात पर निर्भर हैं। खासतौर पर एशिया और अफ्रीका के विकासशील और गरीब देशों के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण बनती जा रही है। सीमित वित्तीय संसाधनों वाले ये देश पहले ही आर्थिक दबाव झेल रहे थे, और अब बढ़ती ईंधन कीमतों तथा सप्लाई में रुकावटों ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

दूसरी ओर, तेल और गैस निर्यात करने वाले देशों को इस स्थिति से कुछ हद तक लाभ भी हो सकता है, क्योंकि ऊंची कीमतें उनके राजस्व को बढ़ा सकती हैं। हालांकि, यह लाभ भी स्थायी नहीं माना जा रहा, क्योंकि वैश्विक मांग में संभावित गिरावट इन देशों को भी प्रभावित कर सकती है।

ऊर्जा संकट का प्रभाव अब खाद्य क्षेत्र में भी दिखाई देने लगा है। ईंधन की बढ़ती लागत के कारण परिवहन महंगा हो गया है, वहीं खाड़ी क्षेत्र से उर्वरकों की सप्लाई प्रभावित होने से कृषि उत्पादन की लागत में वृद्धि हो रही है। इसका सीधा असर आने वाले समय में फसल उत्पादन पर पड़ सकता है, जिससे खाद्य कीमतों में और वृद्धि होने की आशंका है।

IMF की रिपोर्ट में इस बात पर विशेष चिंता जताई गई है कि कम आय वाले देशों में यह स्थिति सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दे सकती है। इन देशों में परिवार अपनी आय का लगभग 36 प्रतिशत भोजन पर खर्च करते हैं, जबकि विकसित देशों में यह आंकड़ा केवल 9 प्रतिशत के आसपास है। ऐसे में खाद्य महंगाई का सीधा और गहरा असर गरीब वर्ग पर पड़ता है।
वित्तीय बाजारों में भी इस तनाव का असर साफ देखा जा रहा है। निवेशकों के बीच अनिश्चितता बढ़ने से पूंजी का प्रवाह प्रभावित हो रहा है और कई देशों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ रहा है। IMF का कहना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह वैश्विक आर्थिक विकास को धीमा कर सकती है और महंगाई को फिर से बढ़ा सकती है।
रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि लगातार बढ़ती कीमतें महंगाई की उम्मीदों को अस्थिर कर सकती हैं। इससे वेतन और कीमतों के बीच एक चक्र शुरू हो सकता है, जिसे नियंत्रित करना केंद्रीय बैंकों के लिए चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।

IMF के अनुसार, इस संकट का अंतिम प्रभाव काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि यह संघर्ष कितने समय तक चलता है और इसकी तीव्रता कितनी बढ़ती है। फिलहाल संस्था स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए है और आने वाले समय में विस्तृत आकलन पेश करने की बात कह रही है।

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