ऑस्ट्रेलिया के स्टार क्रिकेटर उस्मान ख्वाजा ने पहली बार खुलकर बताया है कि मुस्लिम होने की वजह से उन्हें कई बार अपने ही देश में अलग नजरों से देखा गया। उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा आया, जब लोग उनके प्रदर्शन की बजाय उनके धर्म को लेकर ज्यादा चर्चा करने लगे।
ब्रिटिश अखबार The Guardian में लिखे अपने लेख में ख्वाजा ने अपने जीवन के कई ऐसे अनुभव साझा किए हैं, जिन्होंने उन्हें अंदर तक प्रभावित किया। उन्होंने बताया कि क्रिकेट के मैदान पर तो सिर्फ प्रदर्शन मायने रखता है, लेकिन मैदान के बाहर कई बार पहचान धर्म और रंग से तय की जाती है।
ख्वाजा ने बताया कि पश्चिमी सिडनी में बड़े होते समय उन्हें कई बार अपने सांवले रंग और मुस्लिम पहचान की वजह से अलग महसूस कराया गया। उनके मुताबिक, हर बार भेदभाव खुले तौर पर नहीं दिखता, लेकिन लोगों का व्यवहार यह एहसास दिला देता है कि आप बाकी लोगों जैसे नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि क्रिकेट में आने के बाद यह सब खत्म हो जाएगा, क्योंकि यहां सिर्फ प्रदर्शन देखा जाता है। लेकिन राष्ट्रीय टीम तक पहुंचने के बाद भी कई मौकों पर उन्हें अपनी अलग पहचान का एहसास होता रहा।
उस्मान ख्वाजा ने कहा कि पहले लोग इस बात पर चर्चा करते थे कि उन्हें किस नंबर पर बल्लेबाजी करनी चाहिए या टीम में उनकी जगह क्या होनी चाहिए। लेकिन धीरे-धीरे बातचीत का विषय बदल गया।\ उन्होंने लिखा कि उनकी बल्लेबाजी पर चर्चा कम होने लगी और उनकी पहचान सिर्फ एक मुस्लिम खिलाड़ी के रूप में की जाने लगी। यही बात उन्हें सबसे ज्यादा परेशान करती थी।
साल 2019 में न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च की मस्जिदों पर हुए आतंकी हमले का जिक्र करते हुए ख्वाजा ने कहा कि इस घटना ने उन्हें गहराई से झकझोर दिया। उनके अनुसार, किसी भी बड़ी हिंसा की शुरुआत छोटी-छोटी नफरत, गलत धारणाओं और भेदभाव से होती है।
इसी वजह से उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में इस्लामोफोबिया के खिलाफ चल रहे अभियान का समर्थन किया। उनका मानना है कि ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट होना जरूरी है, ताकि लोगों को यह समझ आए कि नफरत सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे समाज को नुकसान पहुंचाती है।
ख्वाजा ने कहा कि मुसलमान भी बाकी लोगों की तरह एक सुरक्षित जीवन, परिवार की खुशहाली, सम्मान और अपने धर्म का पालन करने की आजादी चाहते हैं। उन्होंने बताया कि ऑस्ट्रेलिया ने उन्हें जीवन में आगे बढ़ने के कई अवसर दिए और देश के लिए खेलना हमेशा उनके लिए गर्व की बात रही।
लेख के आखिर में उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में किसी भी मुस्लिम बच्चे को यह महसूस न करना पड़े कि वह अपने ही देश का हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा कि खिलाड़ियों की पहचान उनके खेल से होनी चाहिए, न कि उनके धर्म या पृष्ठभूमि से
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