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AAP का भविष्य क्या होगा ? विचारधारा नहीं तो कैसे जुड़ेंगे कार्यकर्ता ?

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल का किला ध्वस्त हो गया है यानी कि आम आदमी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई है। अब सवाल उठने लगे हैं कि केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का क्या होगा?  क्योंकि अरविंद केजरीवाल खुद की सीट भी हार गए हैं। ना सिर्फ केजरीवाल बल्की उनके सबसे पुराने सहयोगी मनीष सिसोदिया भी चुनाव में अपने सीट नहीं बचा पाए। अब सत्ता गंवाने के बाद अरविंद केजरीवाल विपक्ष के निशाने पर होंगे। क्योंकि यहीं से ये पार्टी लॉन्च हुई थी और यहीं आप का मुख्यालय है। इसलिए यहां पर चुनाव हारना बड़ा झटका है। दिल्ली मॉडल के सहारे ही आम आदमी पार्टी दूसरे राज्यों में जा रही थी। पंजाब में सरकार भी बनी और गुजरात में सफलता मिली। लेकिन अब दिल्ली में हारने से उनके विस्तार की योजना भी प्रभावित होगी। पार्टी का अस्तित्व ही दिल्ली के कारण था।

विचारधारा नहीं तो कैसे जुड़ेंगे कार्यकर्ता ?

सवाल इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि सत्ता से बाहर होने के बाद अरविंद केजरीवाल के लिए अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को पार्टी से जोड़े रखना आसान नहीं होगा। क्योंकि आम आदमी पार्टी की फिलहाल कोई मजबूत विचारधारा बची नहीं। जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ ये पार्टी बनी थी। उसी मुद्दे पर आम आदमी पार्टी घिर गई। आम आदमी पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। इतना ही नहीं अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री रहते हुए भ्रष्टाचार के आरोप में जेल गए, डिप्टी सीएम रहे मनीष सिसोदिया भी जेल गए, कैबिनेट के मत्री रहे सत्येंद्र जैन भी जेल गए, और संजय सिंह जेल गए। तो भ्रष्टाचार के खिलाफ वाली विचारधारा पर ये पार्टी मजबूत नहीं रह पाई। जैसे कि आम आदमी पार्टी की बीजेपी, कांग्रेस, समाजवादी या कम्युनिस्ट पार्टी की तरह कोई एक विचारधारा नहीं है। जिस वजह से कार्यकर्ताओं इस पार्टी से बंधे नहीं रह सकते।

केजरीवाल ने जो कहा उससे उलट किया

दरअसल विचारधारा ही किसी पार्टी को मजबूत रख सकती है। वैसे अरविंद केजरीवाल आमतौर पर ये कहते हुए नजर आते थे की वो नई तरह की राजनीति करने आए हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने आए हैं। लेकिन 10 साल के शासन के दौरान दिल्ली की जनता ने भ्रष्टाचार भी देखा और राजनीति की गिरा हुआ स्तर भी देखा।  बता दें कि अन्ना आंदोलन से इस राजनीतिक पार्टी का गठन हुआ। अरविंद केजरीवाल ने 26 नवंबर 2012 को आम आदमी पार्टी के गठन की घोषणा करते हुए कहा था कि मजबूरी में हम लोगों को राजनीति में उतरना पड़ा। हमें राजनीति नहीं आती है। हम इस देश के आम आदमी हैं जो भ्रष्टाचार और महंगाई से दुखी हैं, उन्हें वैकल्पिक राजनीति देने के लिए आए हैं। लेकिन केजरीवाल ने जो उस वक्त कहा ठीक उसके उलट किया। शाशमहल का मुद्दा भी पूरे चुनावों में गरमाया रहा। क्योंकि जब पार्टी का गठन हुआ था तब केजरवाल कहते हुए नजर आते थे कि वो ना सरकारी गाड़ी लेंगे और ना ही बंगला लेंगे। लेकिन दिल्ली की जनता को सब पता है कि केजरीवाल ने कैसे सरकार चलाई? तो कुल मिलाकर फिलहाल पार्टी के भविष्य पर ही खतरे के बादल मंडराने लगे हैं।

 

 

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