राजस्थान

वसुंधरा मॉडल बंद! कार्यकर्ता बोले – अब कौन सुनेगा?

वसुंधरा मॉडल बंद! कार्यकर्ता बोले – अब कौन सुनेगा?

राजस्थान में भाजपा सरकार बने हुए डेढ़ साल से ज्यादा हो चुका है, लेकिन पार्टी मुख्यालय पर जनसुनवाई कार्यक्रम, जो पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के कार्यकाल की पहचान था, अब ठप पड़ चुका है। कभी जनता और कार्यकर्ताओं को सीधे सत्ता तक पहुंचाने का जरिया रही यह व्यवस्था अब भाजपा सरकार में हाशिए पर नजर आ रही है। भले ही संगठन के नेता कहते रहें कि सत्ता और संगठन में कोई दरार नहीं है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट तस्वीर पेश कर रही है।
पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के दौर में भाजपा प्रदेश कार्यालय पर नियमित जनसुनवाई होती थी, जिसमें मंत्री, विधायक और संगठन पदाधिकारी शामिल होते थे। यह व्यवस्था कांग्रेस सरकार के दौरान भी चलाई गई। लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की सरकार में यह सिलसिला चार दिन बाद ही बंद हो गया। मंत्रियों की गैरमौजूदगी और सरकार की अनिच्छा की वजह से जनसुनवाई कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ सका।

शुरुआत में प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ के नेतृत्व में संगठन ने कार्यकर्ताओं और आमजन की समस्याओं को सुनने के लिए जनसुनवाई का एलान किया। योजना थी कि सोमवार से शुक्रवार तक मंत्री, विधायक और संगठन के पदाधिकारी मिलकर जनता की समस्याएं सुनेंगे। लेकिन जब मंत्री ही इसमें शामिल नहीं हुए, तो यह व्यवस्था मात्र चार दिनों में दम तोड़ गई।

जनसुनवाई के दौरान संगठन के महामंत्री श्रवण सिंह बागड़ी, विधायक जितेंद्र गोठवाल और खुद मदन राठौड़ लोगों की समस्याएं सुनते हैं। लेकिन मंत्री नहीं होने से प्रभावी समाधान नहीं हो पाता। जिन मामलों में तुरंत उच्चाधिकारियों को निर्देश देने की जरूरत होती है, वे अधर में लटक जाते हैं। इससे आम जनता और कार्यकर्ताओं में निराशा और असंतोष बढ़ता जा रहा है।

भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ भले ही कहते हों कि सभी मंत्री अपने आवास पर जनसुनवाई कर रहे हैं, लेकिन कार्यकर्ताओं का पार्टी मुख्यालय पर न सुनना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। पार्टी कार्यकर्ताओं को लगता है कि भाजपा की सत्ता तक उनकी पहुंच पहले जैसी नहीं रही। कुछ नेताओं का मानना है कि सत्ता और संगठन के बीच तालमेल की कमी साफ दिखाई दे रही है, भले ही इसे खुलकर कोई न कहे।

वसुंधरा राजे के कार्यकाल में शुरू हुई जनसुनवाई व्यवस्था का सीधा फायदा आम जनता को मिलता था। पार्टी कार्यालय पर पहुंचकर लोग मंत्री और संगठन पदाधिकारी के सामने अपनी समस्या रखते थे और वहीं से अफसरों को निर्देश दिए जाते थे। इसी मॉडल को कांग्रेस ने भी अपनाया और अपने कार्यालय पर नियमित जनसुनवाई शुरू की।

अब सवाल यह है कि क्या भाजपा फिर से जनसुनवाई शुरू करेगी? संगठन की ओर से संकेत हैं कि फिलहाल ऐसी कोई योजना नहीं है। लेकिन कार्यकर्ताओं का दबाव और जनता की अपेक्षाएं कुछ और कहती हैं। जनसुनवाई लोकतंत्र का मजबूत जरिया है, और इसे फिर से सक्रिय करना भाजपा के लिए जरूरी बनता जा रहा है, खासकर तब जब विपक्ष इस मुद्दे को लेकर हमलावर हो सकता है।

भले ही प्रदेश नेतृत्व सत्ता और संगठन में समन्वय की बात कर रहा हो, लेकिन जनसुनवाई जैसी योजनाओं का ठप हो जाना आम कार्यकर्ता और जनता के बीच दूरी पैदा कर रहा है। यह दूरी अगर जल्द नहीं पाटी गई, तो इसके राजनीतिक परिणाम भी देखने को मिल सकते हैं।

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