लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता राहुल गांधी को इलाहाबाद हाईकोर्ट से तगड़ा झटका लगा है। वीर सावरकर पर विवादित बयान देने के मामले में निचली अदालत से जारी समन को हाईकोर्ट ने खारिज करने से इनकार कर दिया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सावरकर पर कथित अपमानजनक टिप्पणी किए जाने के मामले में कांग्रेस के सांसद और लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी को राहत देने से इनकार कर दिया है। राहुल गांधी ने याचिका दाखिल करते हुए निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनको समन जारी कर जुर्माना लगाया गया था। न्यायालय ने राहुल गांधी की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि उनके पास सत्र अदालत के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दाखिल करने का विकल्प है, इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत उनकी वर्तमान याचिका पर सुनवाई नहीं की जा सकती।
यह मामला उस समय का है जब राहुल गांधी 2022 में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान महाराष्ट्र के अकोला में एक सार्वजनिक मंच से बोल रहे थे। राहुल गांधी ने उस समय वीर सावरकर पर एक विवादित बयान दिया था, जिसके बाद सावरकर समर्थकों और उनके समर्थक दलों ने इस बयान को लेकर राहुल गांधी पर कड़ी आपत्ति जताई थी। राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि सावरकर ने ब्रिटिश शासन के तहत पेंशन ली थी और वह अंग्रेजों के समर्थक थे। साथ ही उन्होंने कहा कि सावरकर ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों के साथ समझौता किया और इस कारण उनका नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नायक के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
राहुल गांधी ने सावरकर के बारे में कई अपमानजनक बातें कही थीं, जिसमें उन्होंने उन्हें अंग्रेजों का पेंशनर तक करार दिया था। यह बयान सावरकर के समर्थकों के लिए एक बड़ा विवाद बन गया था। नृपेंद्र पांडेय नामक एक वादी ने इस मामले में राहुल गांधी के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर किया था। उनका आरोप था कि राहुल गांधी के बयान से देश के स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान हुआ है और यह बयान सार्वजनिक रूप से वैमनस्यता फैलाने के लिए दिया गया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राहुल गांधी की याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि उनकी याचिका इस प्रकार की सुनवाई के योग्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि राहुल गांधी के पास सत्र अदालत में पुनरीक्षण याचिका दायर करने का विकल्प है, और चूंकि याचिका की प्रकृति दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत नहीं आती, इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
यह फैसला राहुल गांधी के लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ है, क्योंकि इस फैसले के बाद उन्हें सत्र अदालत में ही इस मामले को चुनौती देने का अवसर मिलेगा। इसके अलावा, अदालत ने राहुल गांधी पर दो सौ रुपये का हर्जाना भी लगाया था, जो कि उनकी हाजिरी माफी की अर्जी के कारण लगाया गया था।
वीर सावरकर पर विवादों का इतिहास कोई नया नहीं है। उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान नायक के रूप में देखा जाता है, लेकिन उनके जीवन के कई पहलू ऐसे हैं जो समय-समय पर विवादों का कारण बने हैं। सावरकर ने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में भाग लिया था और बाद में एक समय ऐसा आया जब उन्होंने ब्रिटिश सरकार से माफी मांगी और भारत छोड़ने के बदले ब्रिटिश सरकार से पेंशन प्राप्त की थी। यही कारण था कि राहुल गांधी ने उन्हें अंग्रेजों का पेंशनर कहा था।
सावरकर का यह विवादास्पद पक्ष हमेशा से आलोचनाओं का कारण रहा है, जबकि उनके समर्थक उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का नायक मानते हैं। सावरकर के खिलाफ दिए गए बयान को लेकर उनके समर्थकों ने कई बार आपत्ति जताई है, और यह मामला अब एक कानूनी लड़ाई में बदल चुका है।
राहुल गांधी अपनी राजनीति और बयानबाजी के लिए हमेशा सुर्खियों में रहते हैं। वह अक्सर भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखे हमले करते हैं और भारतीय राजनीति में अपनी पार्टी को मजबूत करने के लिए विभिन्न मुद्दों को उठाते रहते हैं। हालांकि, उनके बयानों को लेकर कई बार विवाद भी उत्पन्न हो चुके हैं। राहुल गांधी ने अपनी राजनीति के दौरान कई बार ऐतिहासिक व्यक्तित्वों और घटनाओं पर अपने विचार व्यक्त किए हैं, जिनमें से कुछ बयानों ने राजनीति में तूफान मचाया है।
भारत जोड़ो यात्रा के दौरान, राहुल गांधी ने देश के विभिन्न हिस्सों में यात्रा की थी और वहां पर राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय रखी थी। वीर सावरकर पर उनकी टिप्पणी ने भी इस यात्रा के दौरान विवादों को जन्म दिया। राहुल गांधी के इस बयान को लेकर न केवल भाजपा ने बल्कि कई अन्य राजनीतिक दलों ने भी आलोचना की थी।
वीर सावरकर का भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी भूमिका और योगदान को लेकर विभिन्न दलों के बीच विचारों में मतभेद हैं। जहां एक वर्ग उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान नेता के रूप में देखता है, वहीं दूसरे वर्ग का मानना है कि उन्होंने अंग्रेजों के साथ समझौता किया था और उनके योगदान को इस रूप में सही तरीके से नहीं आंका जा सकता। इस प्रकार सावरकर पर किए गए बयानों के पीछे सिर्फ राजनीतिक विचारधारा ही नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक विमर्श भी काम करता है।
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