उत्तर प्रदेश

Politics in UP heats up: बिहार के नतीजों के बाद यूपी की गरमाई सियासत, कांग्रेस का हाल देख सतर्क हुई समाजवादी पार्टी!, UP में सीट बंटवारे पर आमने-सामने सपा-कांग्रेस!

Politics in UP heats up: बिहार के नतीजों के बाद यूपी की गरमाई सियासत

 

बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के बेहद खराब प्रदर्शन ने उत्तर प्रदेश में महागठबंधन की तैयारियों पर सीधा असर डाल दिया है। बिहार में 61 सीटों पर लड़कर मात्र 6 सीटें जीतने वाली कांग्रेस की 10% स्ट्राइक रेट ने सपा को यूपी में सीट बंटवारे को लेकर सतर्क कर दिया है। चूंकि बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में भी महागठबंधन का मुकाबला सीधे भाजपा के गठबंधन एनडीए से होना है, इसलिए सपा किसी तरह का राजनीतिक जोखिम उठाने के मूड में नहीं दिख रही।

सपा के भीतर मौजूद रणनीतिकारों का अनुमान है कि पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव में 340 सीटों पर खुद चुनाव लड़ेगी। इसका मतलब है कि सहयोगी दलों के लिए सिर्फ 60 से 63 सीटें ही छोड़ी जाएंगी। दूसरी ओर कांग्रेस प्रदेश के सभी 75 जिलों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहती है और इस आधार पर वह 100 से 125 सीटों की दावेदारी पेश कर रही है। इस टकराव ने महागठबंधन की सीट शेयरिंग को लेकर नए समीकरण पैदा कर दिए हैं।

सपा 2022 में भी गठबंधन के साथ चुनाव लड़ी थी। उस समय RLD को 33 सीटें और सुभासपा को 17 सीटें दी गई थीं। इसके अलावा कुछ छोटे दलों को कुल मिलाकर 10 सीटें मिली थीं। सपा के रणनीतिकारों का कहना है कि इस बार स्थिति अलग है, क्योंकि RLD और सुभासपा अब एनडीए के साथ हैं। ऐसे में सपा के पास सहयोगियों के लिए 50–60 सीटें ही बचती हैं और इसी कारण कांग्रेस को अधिक सीटें देना संभव नहीं है।

कांग्रेस की सीट मांग को लेकर भी सपा के भीतर असहमति है। कांग्रेस अमेठी और रायबरेली की सभी 10 विधानसभा सीटों पर लड़ना चाहती है। लेकिन इन सीटों पर सपा के विधायक मौजूद हैं, इसलिए सपा इन सीटों को छोड़ने के मूड में नहीं है। इसी तरह आजमगढ़, अंबेडकरनगर, कौशाम्बी और शामली की सभी सीटों पर सपा पहले से मजबूत स्थिति में है, जिससे कांग्रेस की दावेदारी और कमजोर पड़ जाती है।

कांग्रेस के लिए बड़ा झटका उसका पिछला प्रदर्शन है। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 399 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन सिर्फ दो सीटें जीत सकी और उसका वोट शेयर 2.33% पर सीमित रह गया। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन के बाद उसके वोटबैंक में बढ़त दर्ज हुई और वह 9.46 प्रतिशत तक पहुंच गया। तब उसे 17 सीटें मिली थीं, जिनमें से 6 सीटें कांग्रेस ने जीती थीं।

उन 17 लोकसभा सीटों में आने वाली 85 विधानसभा सीटों में से 39 सीटों पर कांग्रेस को बढ़त मिली थी। कांग्रेस इन 39 सीटों के आधार पर यूपी विधानसभा में 50 से अधिक सीटें चाहती है, लेकिन इनमें भी कई सीटों पर अभी सपा के विधायक हैं।

सपा नेताओं का कहना है कि गठबंधन बनने की स्थिति में सीटें संगठन की जमीन, मौजूदा विधायकों और पिछली बार के अंतर के आधार पर तय होंगी। उन्होंने कहा कि सीटों का निर्णय “गठबंधन की मजबूती” पर होगा, न कि कांग्रेस की “ख्वाहिशों” पर।

सपा इस समय पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फार्मूले को आधार बनाकर चुनावी तैयारी कर रही है। पल्लवी पटेल की अपना दल (कमेरावादी) के हालिया बयानों से यह स्पष्ट नहीं है कि वह गठबंधन में रहेगी या नहीं। लेकिन अखिलेश यादव ने हाल ही में पार्टी की बैठक में संकेत दिए कि अगर गठबंधन हुआ तो उन्हें अधिक सम्मान मिलेगा। अनुमान है कि अगर सब कुछ ठीक रहा तो उनकी पार्टी को 8 के आसपास सीटें दी जा सकती हैं।

सपा के नेताओं का कहना है कि बिहार की तरह यूपी में भी कांग्रेस का कोई ठोस वोट बैंक नहीं है। बिहार में MY (मुस्लिम–यादव) समीकरण महागठबंधन की रीढ़ था, लेकिन कांग्रेस की कमजोरी और ओवैसी की एंट्री से मुस्लिम वोटों में सेंध लग गई। बिहार में यादव और मुस्लिम वोटों में गिरावट ने राजद–कांग्रेस गठबंधन को भारी नुकसान पहुंचाया। यादव वोटर्स का झुकाव जाति आधारित उम्मीदवारों की तरफ चला गया और महागठबंधन में से सिर्फ 12 यादव विधायक ही जीत पाए।

बिहार के इन आंकड़ों और कांग्रेस की कमजोर पकड़ ने यूपी में सपा की रणनीति को और सख्त बना दिया है। सपा जानती है कि यूपी में बसपा का कोर दलित वोट दोबारा संगठित हो रहा है। मायावती की रैली और सक्रियता के बाद बसपा के वोट बैंक में हलचल दिख रही है। दूसरी ओर ओवैसी की AIMIM ने यूपी में सक्रियता बढ़ाई तो मुस्लिम वोटों में भी विभाजन का खतरा बना रहेगा।

पिछड़ों को जोड़ने में बीजेपी ने खासी बढ़त बना ली है। सुभासपा फिर से भाजपा के साथ है, निषाद पार्टी और अपना दल पहले से एनडीए में शामिल हैं। ऐसे में पिछड़ा वोट समीकरण भी एनडीए के पक्ष में जाता दिख रहा है।

इन सभी कारकों को देखते हुए सपा समझती है कि उसे अपने मजबूत क्षेत्रों को किसी भी सूरत में छोड़ना नहीं चाहिए। कांग्रेस ने घोषणा की है कि वह पिछड़े वर्ग को जोड़ने के लिए आगामी दिनों में संविधान पर आधारित चौपाल अभियान शुरू करेगी। यह अभियान 26 नवंबर से शुरू होगा। लेकिन इसका वास्तविक असर पंचायत चुनाव और एमएलसी चुनाव की 11 सीटों के नतीजों से ही स्पष्ट होगा।

Kirti Bhardwaj

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