पशुपति पारस हैं कौन? बिहार और देश की सियासत में वे कितना बड़ा चेहरा हैं? एनडीए से उनके अलग होने की वजह क्या है? ये फैसला कितना असरदार हो सकता है? आइये जानते हैं…
पूर्व केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के मुखिया पशुपति कुमार पारस ने एनडीए का साथ छोड़ने का एलान कर दिया है। इतना ही नहीं पशुपति ने महागठबंधन में भी जगह न बनती देख, बिहार विधानसभा चुनाव में सभी 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की भी बात कही है। पारस कुछ समय पहले तक भाजपा के लिए बेहद अहम सहयोगी के तौर पर देखे जाते थे। वजह थी रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा), जिस पर बडे़ भाई के निधन के बाद पशुपति का ही सबसे ज्यादा प्रभाव था। पार्टी जब दो फाड़ हुई तो भजीते चिराग को छोड़कर अन्य सभी सांसद पारस के साथ चले गए थे। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद चीजें पूरी तरह बदल गईं। अब पारस खाली हाथ रह गए हैं।
भारतीय राजनीति में जब भी दलित राजनीति की बात होती है, तो रामविलास पासवान का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। लेकिन उसी परिवार में एक ऐसा नाम भी है, जो दशकों से राजनीति में सक्रिय रहा है, पर हमेशा छाया में रहा—वो हैं पशुपति कुमार पारस, चिराग पासवान के चाचा और लोक जनशक्ति पार्टी (रालोजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष। हाल ही में उन्होंने एक बड़ा सियासी कदम उठाते हुए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से नाता तोड़ने का एलान किया। उनके इस कदम ने बिहार की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। आइए जानते हैं कि पशुपति पारस कौन हैं, उनका राजनीतिक सफर कैसा रहा, और एनडीए से अलग होने का यह फैसला कितना असरदार हो सकता है।
पशुपति कुमार पारस का राजनीतिक सफर करीब पांच दशक लंबा है। 1977 में जब देश में इमरजेंसी के बाद नई राजनीतिक लहर उठी थी, उसी दौरान रामविलास पासवान राजनीति में उभरे और हाजीपुर से सांसद बने। उसी साल बिहार में विधानसभा चुनाव हुए और अलौली सीट से पहली बार पशुपति पारस चुनावी मैदान में उतरे। उन्होंने यह चुनाव जीत लिया, और यहीं से उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत हुई।
अलौली की यही सीट रामविलास पासवान के लिए भी खास थी क्योंकि यहीं से उन्होंने भी राजनीतिक पारी शुरू की थी। हालांकि, 1980 में जनता पार्टी (सेक्युलर) के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले पशुपति पारस को हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस (आई) के मिश्री सदा ने उन्हें करीब 9,440 वोटों से हराया।
1985 में एक बार फिर उन्होंने वापसी की और उसके बाद 1990, 1995, 2000, फरवरी 2005 और अक्तूबर 2005 में लगातार जीत दर्ज करते रहे। वे तीन बार बिहार सरकार में मंत्री भी बने। उनका पूरा राजनीतिक सफर बड़े भाई रामविलास पासवान की छत्रछाया में आगे बढ़ा। रामविलास जहां-जहां गए, पशुपति ने भी उन्हीं रास्तों पर कदम बढ़ाए। पार्टी बदली, गठबंधन बदले, विचारधाराएं बदलीं—लेकिन पारस अपने भाई के साथ ही रहे।
रामविलास पासवान के निधन के बाद लोक जनशक्ति पार्टी में दो फाड़ हो गई। एक ओर थे चिराग पासवान, जिन्होंने पिता की विरासत का दावा किया, और दूसरी ओर थे पशुपति पारस, जिनके साथ लोजपा के पांच सांसद खड़े हो गए। संसद में भी पारस गुट को मान्यता मिल गई और उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया गया।
यहाँ से चिराग और पारस के रास्ते अलग हो गए। चिराग ने अपनी नई पार्टी—लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) बनाई, जबकि पशुपति ने राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के नाम से नई शुरुआत की। बीजेपी ने भी पारस को साथ बनाए रखा और केंद्र सरकार में उन्हें खाद्य प्रसंस्करण मंत्री बनाया।
2024 के आम चुनावों में जब सीटों के बंटवारे की बात आई तो बीजेपी ने चिराग पासवान को आगे किया। पशुपति पारस को कोई सीट नहीं मिली। यही से उनके मन में नाराजगी घर करने लगी। चुनाव के दौरान उन्होंने कई बार यह संकेत दिए कि उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है।
चुनाव खत्म होने के बाद उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अब वो एनडीए का हिस्सा नहीं रहेंगे। साथ ही उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए सभी 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का एलान कर दिया।
पारस की नाराजगी की मुख्य वजह यही रही कि उन्हें गठबंधन में सम्मानजनक जगह नहीं मिली। वर्षों तक बीजेपी के वफादार सहयोगी रहे पारस को दरकिनार कर दिया गया। उनके अनुसार, न केवल उन्हें सीट से वंचित किया गया, बल्कि पार्टी के अस्तित्व को भी नजरअंदाज किया गया।
इसके अलावा, चिराग पासवान को तरजीह दिया जाना भी एक बड़ी वजह रही। पारस के अनुसार, लोजपा की असली विरासत उनके पास है, और चिराग ने केवल ‘भावनात्मक राजनीति’ के जरिए बीजेपी को साधा।
एनडीए से अलग होने के बाद ये कयास लगाए जा रहे थे कि पारस महागठबंधन में शामिल हो सकते हैं। लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि उन्हें वहां भी कोई जगह नहीं मिल रही। यही वजह है कि उन्होंने अब अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। उनके अनुसार, उनकी पार्टी राज्य के हर कोने में मजबूत है और जनता का साथ मिलेगा।
हालांकि पारस ने बड़े दावे किए हैं, लेकिन हकीकत यह है कि उनके पास संगठनात्मक ताकत सीमित है। अधिकांश विधायक और सांसद पहले ही चिराग के पाले में जा चुके हैं। लोकसभा में अब उनके पास कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।
243 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का ऐलान करना जितना राजनीतिक तौर पर साहसिक है, उतना ही व्यावहारिक रूप से मुश्किल भी है। संसाधनों की कमी, संगठन का ढांचा, और गठबंधन की कमी उनकी राह में बड़ी चुनौती है।
रामविलास पासवान ने अपनी पूरी राजनीति दलितों के अधिकारों के लिए समर्पित की थी। लेकिन उनके जाने के बाद दलित राजनीति खुद पारिवारिक कलह का शिकार हो गई। चिराग ने जिस तरह भावनात्मक कार्ड खेला और युवा नेतृत्व के तौर पर खुद को स्थापित किया, उसमें उन्हें जनता का समर्थन भी मिला।
पारस भले ही वरिष्ठ और अनुभवी हों, लेकिन जनता के साथ उनका सीधा जुड़ाव उस स्तर पर नहीं है जो चिराग के पास है। यही वजह है कि पार्टी टूटने के बाद पारस का जनाधार लगातार कमजोर होता गया।
एनडीए से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला पारस के लिए जोखिम भरा है। अगर वे कोई बड़ा जन समर्थन नहीं जुटा पाते, तो उनकी पार्टी के अस्तित्व पर भी संकट आ सकता है। दूसरी ओर, यह फैसला एनडीए के लिए भी एक छोटा लेकिन प्रतीकात्मक झटका जरूर है—कि पुराने सहयोगियों को कैसे नजरअंदाज किया जा रहा है।
बिहार की राजनीति में जहां जातिगत समीकरण, संगठनात्मक शक्ति और नेता की छवि निर्णायक भूमिका निभाती है, वहां केवल भावनात्मक फैसलों से जमीन नहीं बनाई जा सकती। पारस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वो खुद को एक स्वतंत्र और प्रभावशाली दलित नेता के रूप में दोबारा स्थापित करें।
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