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Parliamentary committee issues: बांग्लादेश संकट पर संसदीय समिति की चेतावनी, भारत के प्रभाव को चुनौती, चीन-पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका से बढ़ी चिंता

Parliamentary committee issues: बांग्लादेश संकट पर संसदीय समिति की चेतावनी

पड़ोसी देश बांग्लादेश में तख्तापलट और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद पैदा हुए हालात को भारत के लिए केवल एक सामान्य कूटनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि एक गहरे और ऐतिहासिक संकट के रूप में देखा जा रहा है। संसद में शशि थरूर की अध्यक्षता वाली विदेश मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने अपनी हालिया रिपोर्ट में बांग्लादेश की स्थिति को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। रिपोर्ट यह संकेत देती है कि ढाका में सत्ता परिवर्तन महज एक सरकार का बदलना नहीं है, बल्कि इसके पीछे भारत के प्रभाव को व्यवस्थित रूप से कमजोर करने की एक व्यापक रणनीति काम कर सकती है।

समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि 1971 के मुक्ति संग्राम के बाद भारत आज बांग्लादेश में अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती का सामना कर रहा है। यह चुनौती सीमाओं पर किसी सैन्य टकराव से नहीं, बल्कि धीरे-धीरे बन रही उस राजनीतिक और वैचारिक स्थिति से जुड़ी है, जिसमें बांग्लादेश की एक पूरी पीढ़ी भारत से दूर होती जा रही है और चीन तथा पाकिस्तान के प्रभाव में आती दिख रही है।

रिपोर्ट में 26 जून 2025 को समिति के समक्ष पेश एक गैर-सरकारी विशेषज्ञ की गवाही का हवाला दिया गया है। विशेषज्ञ ने कहा कि 1971 की चुनौती अस्तित्व से जुड़ी थी, जब एक मानवीय संकट और एक नए राष्ट्र के निर्माण की स्थिति थी। लेकिन मौजूदा संकट उससे कहीं अधिक सूक्ष्म, गहरा और दीर्घकालिक है। विशेषज्ञ के मुताबिक आज का बांग्लादेश वैसा नहीं रहा, जैसा भारत ने अपने संसाधनों और बलिदानों से बनाने में मदद की थी।

रिपोर्ट में ‘जेनरेशनल डिस्कनेक्ट’ यानी पीढ़ीगत दूरी की बात प्रमुखता से उठाई गई है। 1971 के मुक्ति संग्राम की स्मृतियां अब नई पीढ़ी के लिए इतिहास की किताबों तक सीमित होती जा रही हैं। इसके स्थान पर एक ऐसा राष्ट्रवादी विमर्श उभर रहा है, जिसमें भारत को सहयोगी के बजाय संदेह की नजर से देखा जा रहा है। समिति को बताया गया कि अवामी लीग के लंबे वर्चस्व के कमजोर पड़ने और युवा नेतृत्व वाले उग्र राष्ट्रवाद के उभार ने भारत के लिए खतरे की घंटी बजा दी है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस राजनीतिक और वैचारिक खालीपन को भरने के लिए इस्लामवादी ताकतें, चीन और पाकिस्तान एक साथ सक्रिय हो गए हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यह गठजोड़ भारत के लिए विशेष रूप से खतरनाक हो सकता है, क्योंकि यह भारत के रणनीतिक रूप से संवेदनशील ‘चिकन नेक’ या सिलिगुड़ी कॉरिडोर के बिल्कुल पास एक नया दबाव बिंदु बना सकता है।

बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति में शेख हसीना की भूमिका और भारत में उनकी मौजूदगी भी एक बड़ा कूटनीतिक मुद्दा बन गई है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और वहां के कट्टरपंथी गुट लगातार आरोप लगा रहे हैं कि भारत शेख हसीना को अपनी धरती से राजनीति करने की अनुमति दे रहा है। इस पर संसदीय समिति की रिपोर्ट में विदेश सचिव के बयान का उल्लेख किया गया है।

विदेश सचिव ने समिति को बताया कि शेख हसीना अपने निजी संचार उपकरणों के माध्यम से बयान दे रही हैं, जिन पर उनका व्यक्तिगत नियंत्रण है। भारत सरकार न तो उन्हें किसी प्रकार का राजनीतिक मंच उपलब्ध करा रही है और न ही भारतीय क्षेत्र से किसी राजनीतिक गतिविधि की अनुमति दे रही है। यह बयान भारत के आधिकारिक रुख को स्पष्ट करता है कि वह अपनी भूमि का इस्तेमाल किसी अन्य देश के खिलाफ राजनीतिक गतिविधियों के लिए नहीं होने देता।

हालांकि, रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि तकनीक के इस दौर में किसी राजनीतिक नेता को पूरी तरह खामोश कर पाना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है। निजी डिजिटल माध्यमों के जरिए दिए जा रहे बयानों को रोकना किसी भी सरकार के लिए एक जटिल चुनौती बन चुका है। यह स्थिति भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की मुश्किलों को भी उजागर करती है।

शशि थरूर की अध्यक्षता वाली समिति ने विदेश मंत्रालय से एक बेहद अहम और असहज सवाल भी पूछा। समिति ने जानना चाहा कि जब बांग्लादेश में हालात को लेकर इतनी मीडिया रिपोर्ट्स और संकेत मौजूद थे, तो भारत सरकार इस बड़े राजनीतिक भूचाल का पूर्वानुमान लगाने में क्यों चूक गई। यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि भारत पारंपरिक रूप से बांग्लादेश की राजनीति और आंतरिक घटनाक्रमों पर करीबी नजर रखता रहा है।

अपने लिखित जवाब में विदेश मंत्रालय ने कहा कि सरकार बांग्लादेश के घटनाक्रमों पर प्राथमिकता के आधार पर नजर बनाए हुए थी। मंत्रालय ने तर्क दिया कि 7 जनवरी 2024 को हुए आम चुनावों में शेख हसीना की अवामी लीग ने 300 में से 224 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया था, जिससे उनकी स्थिति मजबूत दिखाई दे रही थी। हालांकि मंत्रालय ने यह भी स्वीकार किया कि उस चुनाव में मतदान प्रतिशत मात्र 40 प्रतिशत रहा, जो जमीनी असंतोष की ओर इशारा करता था।

रिपोर्ट का एक और अहम और चिंताजनक पहलू बांग्लादेश में चीन और पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव का विश्लेषण है। अवामी लीग के सत्ता से हटते ही उन ताकतों को नई ऊर्जा मिली है, जो ऐतिहासिक रूप से भारत विरोधी रही हैं। चीन लंबे समय से बांग्लादेश में अपने आर्थिक और रणनीतिक पैर जमाने की कोशिश करता रहा है। मौजूदा राजनीतिक बदलाव के बाद उसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और कर्ज आधारित निवेश के जरिए भारत को किनारे करने का अवसर मिलता दिख रहा है।

वहीं पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई को लेकर भी रिपोर्ट में गंभीर संकेत दिए गए हैं। 1971 की हार के बाद से ही पाकिस्तान बांग्लादेश में प्रभाव बढ़ाने का मौका तलाशता रहा है। समिति के सामने रखी गई जानकारी के अनुसार, इस्लामवादी ताकतों की बढ़ती सक्रियता के पीछे कहीं न कहीं पाकिस्तान की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।

इन तमाम चुनौतियों के बीच विदेश मंत्रालय ने समिति को यह भी बताया कि भारत हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा है। मंत्रालय के अनुसार, भारत की रणनीति यह है कि बांग्लादेश के आंतरिक राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद द्विपक्षीय रिश्तों को यथासंभव स्थिर रखा जाए। इसके तहत सरकार से सरकार और लोगों से लोगों के स्तर पर संवाद बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है। भारत ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के साथ संपर्क जारी रखा है और यह स्पष्ट किया है कि वह बांग्लादेशी जनता की आकांक्षाओं और लोकतांत्रिक हितों का समर्थन करता है।

Ritika Bhardwaj

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