ईरान और अमेरिका के बीच हुए शांति समझौते को लेकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ एक बार फिर चर्चा में हैं, लेकिन इस बार वजह कोई कूटनीतिक उपलब्धि नहीं बल्कि उनके एक दावे पर उठे सवाल हैं। अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के ऐलान के बाद शहबाज शरीफ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट कर दावा किया था कि पाकिस्तान, कतर के सहयोग से, 19 जून को स्विट्जरलैंड में होने वाले अमेरिका-ईरान समझौते के आधिकारिक हस्ताक्षर समारोह की मेजबानी करेगा।
उन्होंने इसे पाकिस्तान की बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में पेश करने की कोशिश की थी। हालांकि बाद में उन्हें अपनी ही पोस्ट में बदलाव करना पड़ा और मेजबानी से जुड़ा पूरा हिस्सा हटा दिया गया, जिससे पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असहज स्थिति का सामना करना पड़ा।
मामला तब और दिलचस्प हो गया जब ईरान ने सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौते पर किसी औपचारिक समारोह में हस्ताक्षर नहीं किए जाएंगे। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघई ने कहा कि समझौता ज्ञापन (MoU) पर दोनों देशों के राष्ट्रपति डिजिटल माध्यम से हस्ताक्षर करेंगे और स्विट्जरलैंड में किसी हस्ताक्षर समारोह का आयोजन नहीं होगा। उन्होंने यह भी बताया कि वार्ता से जुड़े अधिकारी जिनेवा में मौजूद रह सकते हैं, लेकिन समझौते की प्रक्रिया पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक होगी। ईरान के इस बयान ने शहबाज शरीफ के दावे को सीधे तौर पर गलत साबित कर दिया।
शहबाज शरीफ ने 15 जून को किए गए अपने शुरुआती पोस्ट में कहा था कि पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता से अमेरिका और ईरान के बीच समझौता संभव हो पाया है और इस ऐतिहासिक उपलब्धि को यादगार बनाने के लिए 19 जून को स्विट्जरलैंड में एक आधिकारिक समारोह आयोजित किया जाएगा। हालांकि जब ईरान की ओर से वास्तविक स्थिति स्पष्ट की गई तो पाकिस्तान सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा। इसके बाद शहबाज शरीफ ने अपनी पोस्ट को संपादित किया और उस हिस्से को हटा दिया जिसमें पाकिस्तान को समारोह का मेजबान बताया गया था। हालांकि उन्होंने यह दावा बरकरार रखा कि समझौते की प्रक्रिया में पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई है।
बाद में जारी किए गए नए संदेश में शहबाज शरीफ ने कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने समझौते पर इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर कर दिए हैं। उन्होंने इस समझौते का स्वागत करते हुए इसे क्षेत्रीय शांति के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया। हालांकि अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि स्विट्जरलैंड में समारोह की मेजबानी को लेकर किए गए शुरुआती दावे ने पाकिस्तान की कूटनीतिक तैयारी और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आलोचकों का कहना है कि इस्लामाबाद ने अपनी भूमिका को वास्तविकता से अधिक बड़ा दिखाने की कोशिश की, लेकिन ईरान के आधिकारिक बयान के बाद स्थिति स्पष्ट हो गई।
इस पूरे घटनाक्रम ने पाकिस्तान की विदेश नीति और उसकी कूटनीतिक रणनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। एक ओर शहबाज शरीफ इस समझौते को अपनी सरकार की बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर उनके बदले हुए बयान और हटाई गई पोस्ट ने विपक्ष और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों को सवाल उठाने का मौका दे दिया है। फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच समझौता डिजिटल हस्ताक्षरों के जरिए संपन्न हो चुका है, लेकिन इस प्रक्रिया में पाकिस्तान की वास्तविक भूमिका कितनी महत्वपूर्ण थी, इस पर चर्चा जारी है। इस घटनाक्रम ने यह भी दिखाया है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में किसी भी आधिकारिक घोषणा से पहले तथ्यों की पुष्टि कितनी आवश्यक होती है, क्योंकि एक गलत या समय से पहले किया गया दावा किसी देश की साख को प्रभावित कर सकता है।
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