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पूर्व कांग्रेस नेता शकील अहमद का राहुल गांधी पर हमला, “टॉप लीडरशिप में काबिलियत की कमी है”

पूर्व कांग्रेस नेता शकील अहमद ने हाल ही में कांग्रेस की लगातार चुनावी हार के पीछे राहुल गांधी को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि पार्टी में समस्याओं को सुलझाने की इच्छा कम है और टॉप लीडरशिप में क्षमता की कमी है। शकील अहमद का कहना है कि राहुल गांधी चाहें भी तो कांग्रेस को दूसरे नंबर से नीचे नहीं ला सकते, क्योंकि देश की अन्य पार्टियां ज्यादातर सिर्फ एक ही राज्य में सक्रिय हैं।

शकील अहमद ने राहुल गांधी पर तंज कसते हुए कहा कि वह पुराने और अनुभवी नेताओं के साथ काम करने में असहज महसूस करते हैं। उन्होंने बताया कि कांग्रेस में कई ऐसे नेता हैं जो राहुल गांधी से पहले ही राजनीति में सक्रिय थे। शकील अहमद ने कहा, “जब राहुल गांधी ने पहला चुनाव जीता, मैं अपना पाँचवां चुनाव जीत चुका था। ऐसे में उन्हें उन लोगों के साथ बैठना मुश्किल लगता है जो उन्हें बॉस नहीं मानते।”

पूर्व नेता ने यह भी आरोप लगाया कि नेहरू-गांधी परिवार से होने के कारण राहुल गांधी में श्रेष्ठता की भावना है। शकील अहमद ने बताया कि अक्सर उन्होंने राहुल गांधी को सलाह दी, लेकिन उन्हें यह पसंद नहीं आता था कि कोई उनके परिवार के बाहर से उन्हें सलाह दे।

उन्होंने कांग्रेस के अंदरूनी लोकतंत्र पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि पार्टी में राहुल गांधी जो कहते हैं, वही अंतिम निर्णय होता है। कई वरिष्ठ नेता अपनी असहमति सार्वजनिक नहीं करते क्योंकि वे अपनी अगली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित रखना चाहते हैं।

शशि थरूर और कांग्रेस नेतृत्व के बीच के मतभेद पर भी शकील अहमद ने बताया कि उन्होंने शशि थरूर को कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए वोट देना चाहा, लेकिन राहुल गांधी और सोनिया गांधी के समर्थक खरगे के पक्ष में थे। इसलिए उन्होंने अपना वोट उनके पक्ष में दिया।

शकील अहमद ने कहा कि पार्टी में पारदर्शिता की कमी है और वरिष्ठ नेताओं की राय को महत्व नहीं दिया जाता। कई नेता अपने अनुभव साझा करना चाहते हैं, लेकिन डर के कारण वे चुप रहते हैं।

उन्होंने जोर देकर कहा कि राहुल गांधी की व्यक्तिगत मानसिकता और पारिवारिक श्रेष्ठता की भावना ही वरिष्ठ नेताओं के साथ काम करने में असहजता का मुख्य कारण है। इसके चलते कई सुझाव नकार दिए जाते हैं। शकील अहमद का मानना है कि कांग्रेस की हार और संगठन में समस्याओं की वजह शीर्ष नेतृत्व की सोच और वरिष्ठ नेताओं के अनुभव को नजरअंदाज करना है।

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