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Karnataka: हुग्याम वन क्षेत्र में जहर से हुई थी पांच बाघों की मौत, गाय का शव मिलने का पुख्ता हुआ शक; जांच शुरू

कर्नाटक के महादेश्वर हिल्स के हुग्याम वन क्षेत्र में पांच बाघों की रहस्यमयी मौत ने न केवल वन्यजीव प्रेमियों को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि पूरे देश में बाघ संरक्षण की नीतियों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गुरुवार को एक बाघिन और उसके चार शावकों के शव जंगल में मिलने के बाद वन विभाग ने तुरंत उच्च स्तरीय जांच शुरू की। शुरुआती जांच में सामने आया कि इन बाघों की मौत किसी प्राकृतिक कारण से नहीं बल्कि जानबूझकर जहर देने से हुई है। शुक्रवार को इसी इलाके में एक सड़ी-गली गाय का शव मिलने के बाद आशंका और भी पुख्ता हो गई कि गाय को पहले से जहर देकर जंगल में छोड़ा गया और जब बाघिन और उसके शावकों ने उस मांस को खाया तो वे भी जहर का शिकार हो गए।

वन विभाग की शुरुआती रिपोर्ट के अनुसार, गाय का शव तीन से चार दिन पुराना था। यह भी संभावना जताई गई कि किसी स्थानीय व्यक्ति ने मवेशी के मरने के बाद उसके शव पर जहर छिड़क दिया हो, जिससे उसे खाने वाले शिकारी जानवर खत्म हो जाएं। यह एक आम लेकिन खतरनाक प्रवृत्ति है, जिसमें स्थानीय लोग अपने मवेशियों के नुकसान का बदला लेने के लिए या शिकारी पशुओं को मारने की नीयत से इस प्रकार के जहरीले मांस का उपयोग करते हैं। इस मामले में भी यही अंदेशा जताया जा रहा है कि किसी व्यक्ति ने जानबूझकर गाय को जहर दिया और उसका शव जानवरों के लिए उपलब्ध कराया गया।

कर्नाटक के वन मंत्री ईश्वर खांडरे ने इस घटना को अत्यंत गंभीर बताते हुए कहा कि यह न केवल राज्य बल्कि पूरे देश के लिए वन्यजीव संरक्षण पर एक बड़ा हमला है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि राज्य सरकार इस मामले की सभी कोणों से जांच करेगी और जिम्मेदार लोगों को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस घटना से वन विभाग के अंदर चौकसी और सतर्कता और भी ज्यादा बढ़ाई जाएगी ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाएं न हों।

गौरतलब है कि यह घटना उस समय सामने आई है जब भारत सरकार और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) देशभर में बाघों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए कई योजनाओं को लागू कर रही है। बाघों की मौत का यह मामला न केवल इन प्रयासों पर पानी फेरता है, बल्कि स्थानीय समुदाय और वन्यजीवों के बीच के संघर्ष को भी उजागर करता है।

घटना का क्रम और वन विभाग की कार्रवाई

हुग्याम वन क्षेत्र में नियमित गश्त कर रही वन विभाग की टीम को गुरुवार सुबह एक बाघिन का शव मिला। शव की स्थिति देखकर संदेह हुआ कि मौत किसी विषैले तत्व के कारण हुई है। जब टीम ने आसपास की खोज की तो थोड़ी ही दूरी पर चार शावकों के शव भी पड़े मिले। यह एक दिल दहला देने वाला दृश्य था। बाघिन के शव का पोस्टमार्टम उसी दिन कर लिया गया जबकि शावकों का पोस्टमार्टम शुक्रवार को किया गया।

इसके बाद शुक्रवार को ही एक सड़ी-गली गाय का शव भी जंगल में मिला, जिससे पूरी आशंका इस ओर गई कि शायद उसी मांस को खाने के बाद बाघिन और उसके बच्चे मारे गए। शवों के पास किसी प्रकार के जाल या फंदे के चिन्ह नहीं थे, जिससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि मौत का कारण गोली या जाल नहीं, बल्कि किसी आंतरिक जहरीले तत्व का सेवन है।

एनटीसीए की जांच और सैंपलिंग प्रक्रिया

जांच को वैज्ञानिक तरीके से अंजाम देने के लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की पांच सदस्यीय टीम मौके पर पहुंची और उन्होंने शवों का परीक्षण एनटीसीए के प्रोटोकॉल के तहत किया। टीम ने ऊतक, रक्त और पेट के सैंपल लिए जिन्हें विषविज्ञान, ऊतक विज्ञान और डीएनए प्रोफाइलिंग के लिए लैब में भेजा गया है। इस जांच से यह स्पष्ट होगा कि किस प्रकार का जहर प्रयोग में लाया गया और यह शरीर में किस मात्रा में पहुंचा।

परीक्षण के साथ ही पूरे क्षेत्र को विशेष निगरानी में रखा गया है। रियल टाइम ड्रोन निगरानी, इन्फ्रारेड कैमरे, और GPS आधारित M-STRIPES गश्त को बढ़ा दिया गया है। इसके अलावा शिकार विरोधी शिविरों को हाई अलर्ट पर रखा गया है और स्थानीय ग्रामीणों से पूछताछ शुरू कर दी गई है।

कर्नाटक में बाघों की स्थिति और वन्यजीव संरक्षण की चुनौतियाँ

भारत में बाघों की संख्या तेजी से घटने और बढ़ने के चक्र से गुजर चुकी है। हालांकि पिछले एक दशक में कई प्रयासों के बाद बाघों की संख्या में सुधार हुआ है, लेकिन फिर भी कई राज्य अभी भी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहे हैं। वर्ष 2022 की “भारत में बाघों, सह-शिकारियों और शिकार की स्थिति” रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक में 563 बाघ हैं जो इसे मध्य प्रदेश के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा बाघ आबादी वाला राज्य बनाता है।

कर्नाटक के कई हिस्से जैसे बांदीपुर, नागरहोल, भद्र, और भालुक्के प्रमुख बाघ निवास क्षेत्र हैं। महादेश्वर हिल्स, जहां हुग्याम वन क्षेत्र स्थित है, भी हाल ही में बाघों की आवाजाही के लिए जाना जाता रहा है। इस इलाके में बाघ संरक्षण की नई योजनाओं पर भी काम चल रहा है, लेकिन इस घटना ने उनकी प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

स्थानीय समुदाय और बाघों के बीच टकराव

बाघ संरक्षण का सबसे बड़ा संकट अब शिकारियों से कम और स्थानीय समुदाय से अधिक बन गया है। ग्रामीणों का कहना है कि बाघ अक्सर उनके मवेशियों को निशाना बनाते हैं जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान होता है। बदले में कुछ लोग बाघों को मारने के लिए इस प्रकार की खतरनाक रणनीतियों का उपयोग करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक स्थानीय समुदायों को बाघ संरक्षण का भागीदार नहीं बनाया जाएगा, तब तक इस तरह की घटनाओं को रोकना मुश्किल होगा।

सरकार और वन विभाग को चाहिए कि वे ऐसे क्षेत्रों में मुआवजा योजना, पशुधन सुरक्षा उपाय और सामुदायिक प्रशिक्षण जैसे कार्यक्रमों को लागू करें जिससे ग्रामीण अपने जानवरों की रक्षा कर सकें और उन्हें वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके।

भविष्य की दिशा और सुझाव

यह घटना केवल पांच बाघों की मौत नहीं है, यह पूरे बाघ संरक्षण तंत्र पर हमला है। भारत ने दुनिया में सबसे अधिक बाघों की संख्या को बनाए रखने का गौरव प्राप्त किया है, लेकिन इस तरह की घटनाएं न केवल उस गौरव को आघात पहुंचाती हैं बल्कि यह भी दिखाती हैं कि अभी भी कई स्तरों पर सुधार की आवश्यकता है।

वन मंत्री ईश्वर खांडरे ने स्पष्ट कहा है कि सरकार इस पूरे मामले में सख्त कार्रवाई करेगी और दोषियों को कड़ी सजा दी जाएगी। साथ ही, आने वाले समय में बाघ क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए और भी अधिक सख्त निगरानी व्यवस्था लागू की जाएगी।

आने वाले महीनों में हुग्याम वन क्षेत्र को एक मॉडल संरक्षण क्षेत्र के रूप में विकसित करने की योजना बनाई जा रही है जिसमें स्थानीय समुदाय की भागीदारी, हाईटेक निगरानी प्रणाली और वन्यजीव शिक्षा कार्यक्रम शामिल होंगे। इसी के साथ राज्य सरकार ने प्रस्ताव रखा है कि सभी संवेदनशील वन क्षेत्रों में हर सप्ताह निगरानी समीक्षा हो और प्रत्येक संदिग्ध गतिविधि पर तुरंत कार्रवाई की जाए।

Vishal Singh

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