बर्खास्त MLA मीणा को मिलेगी माफी, मचेगा बवाल जानीए पूरा मामला

बर्खास्त MLA मीणा को मिलेगी माफी, मचेगा बवाल जानीए पूरा मामला

राजस्थान के बारां जिले की अंता विधानसभा सीट से बर्खास्त भाजपा विधायक कंवरलाल मीणा की दया याचिका को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। वर्ष 2005 में तत्कालीन एसडीएम पर पिस्तौल तानने और एक प्रशासनिक अधिकारी का कैमरा छीनकर तोड़ने के मामले में कोर्ट ने कंवरलाल को तीन साल की सजा सुनाई थी। इस सजा को हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने बरकरार रखा। अब जब कंवरलाल ने राज्यपाल के समक्ष दया याचिका दाखिल की है, तो यह मुद्दा राजनीति में तूल पकड़ता नजर आ रहा है।

3 फरवरी 2005 को झालावाड़ जिले के मनोहर थाना क्षेत्र में स्थित दांगीपुरा-राजगढ़ मोड़ पर ग्रामवासियों ने उपसरपंच चुनाव में धांधली का आरोप लगाते हुए सड़क जाम कर दी थी। मौके पर तत्कालीन एसडीएम रामनिवास मेहता, प्रोबेशनर आईएएस अधिकारी डॉ. प्रीतम बी. यशवंत और तहसीलदार पहुंचे। इसी दौरान भाजपा नेता कंवरलाल मीणा अपने समर्थकों के साथ मौके पर पहुंचे और एसडीएम की कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उन्होंने दोबारा मतगणना करने की धमकी दी। विरोध के बीच उन्होंने सरकारी वीडियोग्राफर की कैसेट और कैमरा तोड़ डाला।

इस गंभीर प्रकरण में ट्रायल कोर्ट ने कंवरलाल मीणा को तीन साल की सजा सुनाई। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील की, लेकिन दोनों जगह से उन्हें कोई राहत नहीं मिली। मई 2025 में उन्होंने सरेंडर किया, और इसके बाद 23 मई को उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त कर निर्वाचन आयोग को सूचित किया गया।

अब जबकि कंवरलाल मीणा जेल में हैं और स्वास्थ्य खराब होने के चलते अस्पताल में भर्ती हैं, उन्होंने राज्यपाल के समक्ष दया याचिका दाखिल की है। इस याचिका पर विचार करते हुए झालावाड़ पुलिस अधीक्षक ने अकलेरा और मनोहर थाना पुलिस से राय मांगी है। पुलिस कार्यालय से भेजा गया यह पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसके बाद यह मामला और ज्यादा चर्चा में आ गया है।

नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर भारतीय जनता पार्टी पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया पर वायरल पत्र को साझा करते हुए आरोप लगाया कि भाजपा का असली चेहरा अब सामने आ गया है। उन्होंने कहा, “क्या किसी आम आदमी को भी इस तरह सजा माफ की जाती है, या यह विशेषाधिकार सिर्फ भाजपा नेताओं के लिए है?”

जूली ने कहा कि पहले विधायक की सदस्यता रद्द करने में देरी की गई और अब सजा माफी की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। यह दिखाता है कि भाजपा लोकतंत्र और संविधान में विश्वास नहीं रखती और “एक देश, दो विधान” चलाने की मंशा रखती है — एक आम जनता के लिए और एक भाजपा नेताओं के लिए।

कंवरलाल मीणा की दया याचिका पर राज्यपाल का फैसला जो भी हो, लेकिन इससे पहले ही यह मामला राजनीतिक अखाड़े में केंद्र बिंदु बन गया है। विपक्ष इस मुद्दे को भाजपा की नैतिकता और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। आने वाले दिनों में यह मामला राजस्थान की सियासत में और भी बड़ा मुद्दा बन सकता है।

 

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