CLP लीडर को लेकर छिड़ा कांग्रेस में विवाद
हरियाणा के करनाल जिले में कांग्रेस की गुटबाजी एक बार फिर से नजर आई है। क्योंकि, जबसे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को CLP लीडर के रूप में चुना गया है। तबसे पार्टी में खुशी के साथ-साथ तीखी बयानबाज़ी और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी तेज होता जा रहा है।
इस बीच करनाल के एक स्थानीय कार्यक्रम में कांग्रेस नेता पप्पू लाठर और पूर्व विधानसभा स्पीकर कुलदीप शर्मा के बीच तीखी नौकझोक सामने आई, जिसने पार्टी की एकजुटता पर नए सिरे से सवाल खड़े कर दिए।
दरअसल ये मामला करनाल में हुए एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पप्पू लाठर के तीखे बयानों ने अंदरूनी दरारों की तस्वीर फिर उजागर कर दी है। जिसमें पप्पू लाठर ने सार्वजनिक मंच से पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और राजनीतिक वरिष्ठ कुलदीप शर्मा पर निजी और राजनैतिक दोनों तरह के सवाल उठाए।
उनका कहना है कि जो नेता वर्षों तक हुड्डा के साथ रहे, आज वही नेता उनकी सफलता पर सवाल उठा रहे हैं। पप्पू लाठर ने सीधे शब्दों में कहा कि, अगर हमारी पार्टी पर धनबल का कब्जा था तो उस कब्जे को संभव करवाने में पूर्व स्पीकर का भी बड़ा हाथ रहा है, ऐसे में अब उन पर चल रही आलोचना उपयुक्त नहीं दिखती।
इस तर्क के साथ उन्होंने ये भी जोड़ा कि 1994 से मार्च 2025 तक जो रवैया रहा, उसने आज के आरोपों को निराधार बना दिया है।
साथ ही पप्पू लाठर ने कुलदीप शर्मा की मानसिक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि, उन्हें दिमागी डॉक्टर से इलाज कराने की सलाह दे डाली। ये बयान उस समय आया जब पप्पू लाठर हुड्डा के CLP बनने पर मिठाई बांट रहे थे और स्थानीय जनसमूह भी मौजूद था।
लाठर की इस भाषा ने तेज़ आलोचना और चर्चा दोनों को जन्म दिया है। कुछ लोग इसे भाषा की अतिश्यक्ति मान रहे हैं तो कुछ इसे सत्तारूढ़ निर्णय का बचाव।
कांग्रेस के अंदरूनी गतिरोध की एक झलक तब भी दिखी जब लाठर ने बताया कि, पार्टी के टिकट और नेता चयन को लेकर भी रोशनी में विरोधाभास रहे। वे उदाहरण के तौर पर ये बताते हैं कि, कैसे कुछ सीटों पर टिकटों के ऐलान के बाद भी अपेक्षानुसार फैसले नहीं हुए, और नेताओं ने व्यक्तिगत असंतोष जताया।
लाठर ने खासकर उस बात पर चोट की कि, कई बार पार्टी कार्यालय से नहीं बल्कि कोठियों से हुकूमत चलने जैसी बातें हवा में उड़ती रही हैं, और आज वही लोग जिनके साथ वर्षों तक काम किया, वे ही उन पर सवाल उठा रहे हैं।
स्थानीय राजनीतिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए जरूरी है कि, हम पिछले तीन दशक के कालखंड को देखें वे नेता जिन्होंने तब रैलियों में हुड्डा के साथ कदम से कदम मिलाकर काम किया, आज वही लोग कुछ अलग राग अलाप रहे हैं। पप्पू लाठर ने सीधे-सीधे कहा कि, ऐसे नेताओं में अब कमी खोजना आसान हो गया है।
उदाहरण के तौर पर उन्होंने उस समय के फैसलों की ओर इशारा किया जब कुछ नेताओं ने टिकट लेने से इनकार किया था, ये मानकर कि, आने वाली सरकार में वही लोग आगे बढ़ेंगे पर जब परिणाम अलग आए तो अब उनके हिस्से में शिकायतें आईं।
ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक इस पूरे घटनाक्रम को समझते हुए कहते हैं कि, हर राजनीतिक दल में सत्ता-साझेदारी, टिकट वितरण और स्थानीय प्रभावकारिता को लेकर अक्सर असंतोष उभरता है। पर बात तब संवेदनशील बन जाती है, जब आरोप-प्रत्यारोप व्यक्तिगत स्तर तक पहुंचते हैं।
किसी नेता की मानसिक या शारीरिक स्थिति पर टिप्पणी करना राजनीतिक विमर्श को व्यक्तिगत आरोप में बदल देता है, जिससे आगे के विवाद और भी तीखे हो सकते हैं। राजनीतिक पारा बढ़ने का मतलब है कि, विरोधी दल और मीडिया भी इन बयानों को गरमाइश से कवर करेंगे, जिससे सार्वजनिक धारणा पर असर पड़ेगा।
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